Friday, 26 April 2019

उन्मुक्त लघुकथा



                                     TRAIL

उन्मुक्त लघुकथा के इस संस्करण में आपकी रचना शामिल की गई है ।


1.               अंतिम संस्कार
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        मीरा बहुत बीमार थी।उसे पेट में असहनीय पीड़ा हो रही थी।डाक्टर ऑपरेशन करने को कह रहे थे ।उसका पति खाट पर लेटा हुआ खर्चा का हिसाब लगा रहा था ।ऑपरेशन का खर्चा  , अस्पताल का खर्चा,दवाई सब मिलाकर पचास हजार से ज्यादा हो रहा था ।बीमारी में पहले ही बहुत खर्चा हो चुका था ।कहाँ से लाये वह इतना पैसा? लेटे लेटे उसकी निगाह अपनी झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अपनी झोपड़ी बेच देते हैं ।'वह बोला ।
    'नहीं!बिलकुल नहीं ।एक छत ही तो है हमारे पास ।मैं तुम्हें और बच्चों को बेघर नहीं होने दूँगी ।भले ही मेरी जान क्यों न चली जाये ।'मीरा बोल पड़ी।
       सचमुच बिना इलाज के मीरा चल बसी।रघु पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा ।अब वह मीरा के अंतिम संस्कार के खर्चों का हिसाब कर रहा था ।दाह-संस्कार, पंडितों के खर्चे,भाई-बंधुओं को खिलाना  -कुल खर्चा पचास हजार से ज्यादा हो रहे थे।उसकी नजर फिर झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अंतिम संस्कार तो करना ही पड़ेगा ।झोपड़ी बेच देता हूँ ।'वह सोच रहा था ,काश उसने पहले ही अपनी झोपड़ी बेच दी होती तो मीरा आज जिन्दा होती।

                        रंजना वर्मा

2.   धर्म का पर्दा
     
        पूजा स्कूल से आते ही माँ के गले लिपट गयी और चहकते हुए बोली, '' माँ आज मेरे क्लास में एक नयी लड़की आयी...सकीना, बहुत प्यारी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी बन गयी। हम दोनों ने साथ मिल कर लंच किया। उसके लंच में परांठा था जो बहुत ही स्वादिष्ट था। ''
     ' सकीना? यह तो मुस्लिम नाम है, आज के बाद तुम उससे दोस्ती नहीं करोगी और न ही उसकी कोई चीज़ खाओगी।'' पूजा की माँ सविता ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए कहा।
  'पर क्यूँ माँ? वो तो बहुत अच्छी है और पढ़ाई में भी होशियार है। '
  'बेटा वो लोग मुस्लिम हैं और हम हिन्दू। हमारे धर्म अलग हैं... हमारा उनका कोई मेल नहीं। '
'यह धर्म क्या होता है माँ? सकीना तो बिल्कुल हमारे ही जैसी दिखती है.. वो हमसे अलग कैसे?'
   ' तुम नहीं मिलोगी उससे, बस इतना याद रखो.. हम हिंदू हैं और वो मुसलमान। '
   पूजा को तो चुप करा दिया पर उसके बालमन पर इसका क्या प्रभाव हुआ यह सविता न समझ सकी।
    कुछ दिनों बाद पूजा और सविता राशन लेने एक पन्सारी की दूकान पर गये जहाँ सकीना और उसकी माँ भी गेहूँ ले रही थीं। सविता के कहने पर दूकानदार ने उसी कनस्तर से गेहूँ तौलना शुरू किया जिसमें से उसने सकीना की माँ रूबीना को दिया था।
  ''  अरे अंकल! पूजा ने दूकानदार को टोकते हुए कहा, हमें ये वाला गेहूँ नहीं चाहिए, हमें तो आप हिंदू गेहूँ दीजिए। ''
   ''हिन्दू गेहूँ? बेटा गेहूँ हिंदू या मुसलमान नहीं होता। ''
'भगवान की बनायी कोई भी चीज़ हिंदू - मुस्लिम नहीं होती... इन नैसर्गिक चीज़ों का कोई धर्म नहीं होता। '
'पर माँ तो बोलती हैं कि सकीना का भोजन मुस्लिम है... है न माँ?'
  सविता पूजा के मासूम सवालों का कोई जवाब न दे पायी। वह सोचने पर मजबूर हो गयी कि जब भगवान ने कोई भेदभाव नहीं रखा तो वह क्यों इस कट्टर परंपरा का वहन कर रही है...
सविता की आंखों पर पड़ा धर्म का पर्दा हट चुका था और उसने पूजा और सकीना को गले से लगा लिया।
                                          गीता चौबे
                                         रांची झारखंड



3.   लुटी सी खुशी
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सरला और समीर का इकलौता पुत्र था क्षितिज। शादी के कई सालों के बाद कितने ही इलाज और मन्नतों के पश्चात उन्हें इस पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। बड़े ही नाजों से पाला था उन्होंने अपने लाडले को। यथासंभव जीवन की सारी खुशियाँ प्रदान की। अपने जीवन के एकमात्र सहारे के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने अपने वर्तमान की भी परवाह नहीं की।
                         क्षितिज भी बहुत ही होशियार, समझदार और अत्यंत संस्कारी लड़का था। किन्तु जब उच्च शिक्षा के लिए उसने विदेश जाने की इच्छा जाहिर की तब थोड़ी झिझक के बाद सरला और समीर दोनों मान गए थे। अपने पुत्रमोह को वे  क्षितिज की उड़ान में बाधक नहीं बनाना चाहते थे। शिक्षापूर्ति के पश्चात क्षितिज के घर वापसी के लिए वे पूर्णतया आश्वस्त थे।
                     पढ़ाई पूर्ण करके दो वर्षों के पश्चात  क्षितिज वापस आने वाला था। उच्च शिक्षा और एक बेहतरीन नौकरी के साथ आने वाले अपने पुत्र के स्वागत की तैयारियों में वे दोनों व्यस्त हो गए थे। उससे मिलने और साथ साथ रहने के खयाल से ही दोनों पुलकित हुए जा रहे थे।
          आखिर इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं।बड़े ही हर्षोल्लास से माता पिता दोनों ने अपने लाडले का स्वागत किया। रात को जब सभी साथ साथ भोजन कर रहे थे तभी अचानक एक विस्फोट की तरह ही क्षितिज ने अपने मन की बात माता पिता को बताई। दरअसल क्षितिज को उसकी योग्यतानुसार ही किसी बड़ी विदेशी कंपनी में मनवांछित नौकरी मिल गई थी और क्षितिज ऐसा मौका गँवाना नहीं चाहता था। उसके वापस विदेश जाने और वहीं नौकरी करने की बात सुन दोनों हतप्रभ थे।
                           दो दिनों के बाद ही क्षितिज की वापसी थी। इन दो दिनों में अपने माता पिता की सुविधाओं की पूरी व्यवस्था कर क्षितिज जल्द ही वापस आने का आश्वासन देकर विदेश चला गया।समीर और सरला अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी लुटी हुई खुशियों को जाते देख रहे थे और समझ नहीं पा रहे थे कि पुत्र की इतनी बड़ी उपलब्धि की खुशी मनाएं या उसका अपने से दूर जाने का गम।
                                       रूणा रश्मि
                                     राँची , झारखंड

1 comment:

Shubham said...

Beautiful story