Wednesday, 24 April 2019

लघु कविता

बाजार
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ये दुनिया एक बाजार है
यहाँ बेच रहा हर शख्स
अपना सामान है
यहाँ तन बिकता है
मन बिकता है
बिकता इंसान का ईमान भी है
पशु हो या इंसान
सबकी एक किमत है
बोली लग रही है और
चौराहे पर खड़ा इंसान है
तरह तरह के गोश्त
भरे पड़े हैं बाजार में
गोश्त देख कर
लार टपकाते लोग
कसाई खड़े है बाजार में
किमत लगाते लोग
हर चीज बेचने को तैयार
हर चीज़ खरीदने को तैयार
स्वार्थ का मेला है
लोग हैं बेहरूपिये के वेश में
मन घबराता है
जिन्दगी के  इस बाजार में
     
             रंजना वर्मा

1 comment:

runa said...

बिलकुल सही👌👌