Tuesday, 30 April 2019

कविता

××पानी रे पानी ××
------------------------
सूर्य प्रकट हुआ लिए प्रचंड रूप
बरस रहे आग के गोले
तीव्र हो गई उसकी धूप
धरती रही सुलग
नदी,तालाब गये सूख
जीव-जन्तु रहे तड़प
मानव कंठ भी गया सूख
चारों ओर घर और सड़क बन रहे
पर्वत-वृक्ष सब कट रहे
नाराज प्रकृति दिखा रही क्रोध
तैयार हो जाओ झेलने उसका प्रकोप
वक़्त है अभी भी संभल जाओ
बहुत किया दोहन,अब ठहर जाओ
पृथ्वी की सिसकी गुंज रही चारों ओर
पानी रे पानी
तू तो चला रसातल की ओर...

                       रंजना वर्मा
                    

No comments: