पुस्तक दिवस के अवसर पर...
कितनी बदल गयी है
आज पुस्तक की दुनिया
अब तो बिन पुस्तक के ही
स्कूल है जाती अपनी मुनिया
हमारी चिर परिचित पुस्तक की जगह
ई-पुस्तक ने कब्जा जमा लिया है
पुस्तकों को पीठ का बोझ बता
उन्हें कंप्यूटर में समा दिया है
कभी ऐसा भी था पुस्तक का जमाना
जब उनींदी आँखों को पुस्तक में पड़ता छुपाना
शिक्षक की मार से पुस्तक का ढाल बनाना
पुस्तक में रख गुलाब को यादगार बनाना
पुस्तकों का आदान प्रदान कभी मुहब्बते इजहार होता
तो कभी पुस्तकधारिणी शारदे का त्योहार होता
पुस्तकों के सहारे रेल का सफर बड़ा आसान होता
देख हाथ में पुस्तक सरे राह नाचीज़ का सम्मान होता
गीता चौबे

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