Saturday, 27 April 2019

httअच्छा किया  ...

अच्छा किया जो तुमने साथ छोड़ा,
मेरी आसमां में उड़ने की चाह न थी
तुम्हें जमीं भाता न था ।
मुझे सूर्य की लालिमा अच्छी लगती,
तुम्हें सुबह उठना ही नागवार गुजरता।
पछी का कलरव मुझे अच्छा लगता,
लेकिन उस शोर से तुम्हें सिर दर्द ।
तुम्हें छुट्टियों में पहाड़ खींचता,
 मुझे अपने  गांव के खेत।
घर का खाना ही मुझे अच्छा लगता,
तुम्हें होटल के एंबियंस।
गपशप कर जिससे मैं खुश रहता, वो तुम्हें गवांर लगते।
फिर भी हम कितने दिन साथ रहे,
तुमने भी कोशिश कम न की,
कसर हमने भी कोई  न छोड़ी,
  लेकिन विचार मिल न ही पाए।
ऐसा न था कि साथ अच्छा न लगता,
लेकिन मन पे लगाम लगा ही रहता।
तुमने ही तो हिम्मत दिखाई,
मैं तो कमजोर ही निकला।
तुम्हारी यही निर्णय की क्षमता,
मुझे अभिभूत कर जाता।
ना गिला ना शिकवा,
 हां याद  तो आओगी ही
लेकिन तुम भी अपने रह चलो,
मैं भी अपने पथ,
ना तो कोई बंधन हो ना ही कोई संतप्त।
                                     राजीव, रांची।

3 comments:

Geeta choubey said...

बहुत सुन्दर रचना

संतोष सुधाकर said...

खूबसूरत आगाज़

रंजना वर्मा said...

बहुत बढ़िया 👌👌