अंतरद्वंद्व
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होठ मौन थे पर अंतर था मुखर मुखर,
यादों के बादल आते थे उमड़ घुमड़,
कितनी खट्टी-मीठी, कड़वी यादों की,
ज़ख्मों की छालों की आई भीड़ उमड़।
एक दीप की लौ नन्ही थी डोल रही,
मेरे कंपित मन को मानो तोल रही,
बोली यादें यादें हैं यादों का क्या,
जीवन बहती धारा है क्या नहीं पता?
छोड़ किनारों को बढ़ती ही जाती है,
मुड़कर पीछे कभी लौट ना पाती है,
अक्स पुराने लाख उन्हें उलटो पलटो,
नया रंग उन पर ना चढ़ने वाला है,
नये पलों में चाहो जैसा रंग भरो,
स्वागत हो उसका जो आने वाला है।
जी. सी. मिश्रा
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होठ मौन थे पर अंतर था मुखर मुखर,
यादों के बादल आते थे उमड़ घुमड़,
कितनी खट्टी-मीठी, कड़वी यादों की,
ज़ख्मों की छालों की आई भीड़ उमड़।
एक दीप की लौ नन्ही थी डोल रही,
मेरे कंपित मन को मानो तोल रही,
बोली यादें यादें हैं यादों का क्या,
जीवन बहती धारा है क्या नहीं पता?
छोड़ किनारों को बढ़ती ही जाती है,
मुड़कर पीछे कभी लौट ना पाती है,
अक्स पुराने लाख उन्हें उलटो पलटो,
नया रंग उन पर ना चढ़ने वाला है,
नये पलों में चाहो जैसा रंग भरो,
स्वागत हो उसका जो आने वाला है।
जी. सी. मिश्रा
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