Wednesday, 24 April 2019

लोकतंत्र का चुनाव


लोकतंत्र का चुनाव

    आज सुबह से सगुनी बहुत खुश थी। आज उसके पांव जमीन पर नहीं थे। आज मंत्रीजी उसके घर आनेवाले थे। सगुनी एक दलित महिला थी जो मैला ढोने का काम करती थी। समाज के ऊँचे तबके की औरतें उससे घृणा करती थी।
               सगुनी ने अपने दो कमरों के पक्के मकान को जो ' प्रधान मंत्री आवास योजना ' के अंतर्गत उसे मिला था, अच्छे से साफ सुथरा कर चमका दिया था। पुराने बक्से में सहेज कर रखे गए गुदड़ी को झाड़ कर अपनी टूटी हुई खाट पर करीने से बिछा दिया था। मंत्री जी को उसपर बैठाना जो था।
              हारी - बीमारी के लिए थोड़े से पैसे बचा के रखे थे उससे थोड़ी सी भिंडी खरीद के लाई। साथ में थोड़ी गुड की डली भी ले लिया। बड़े प्यार से उसने भिंडी की सब्जी और रोटी बनाई।
            समय पर मंत्रीजी पधारे। सगुनी के घर के आसपास लोगों की भीड़ लग गई थी, उसमें गाँव के मुखिया जी सबसे आगे थे और ऊँचे तबके की वही संभ्रांत महिलाएं जो सगुनी को देख नाक - भौं सिकोड़ती थी, आज उसके भाग्य से ईर्ष्या कर रही थीं। सबकी जुबान पर सगुनी का ही नाम था।
   जैसे ही मंत्रीजी ने सगुनी के घर में कदम रखा, उसने मंत्रीजी को माला पहनाई और उनके पैर छुए। मंत्रीजी ने भी दिल खोलकर आशीर्वाद दिया। सगुनी ने बड़े प्यार से भिंडी की सब्जी और रोटी मंत्रीजी के सामने परोसी। मंत्रीजी ने भी बड़े चाव से भोजन किया और अंत में गुड़ खाकर शीतल जल पिया।
  अपने शब्दों में गुड़ सी मिठास लाते हुए सगुनी से कहा, '' कोई भी तकलीफ हो तो मुझे बताना, मैं जनता की सेवा के लिए सदा तत्पर रहूंगा। '' सगुनी मंत्रीजी के इस आश्वासन से अभिभूत हो गई।
   अगले दिन टीवी और अखबार में यही खबर छायी रही, '' मंत्रीजी ने दलित के घर भोजन किया '' गर्रीबों के सच्चे हमदर्द ''। सबकी नज़र में मंत्रीजी की छवि '' दलितों और गरीबों के मसीहा '' के रूप में उभरकर सामने आई।
         कुछ ही दिनों बाद लोकसभा का चुनाव हुआ। मंत्रीजी भारी मतों से विजयी हुए। और इसबार सत्तारूढ़ सरकार के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए।
सगुनी बहुत खुश थी कि जिन्हें अपनी थाली में भोजन कराया वो आज प्रधानमंत्री बन गए।
     एक दिन सगुनी के गाँव के मुखिया ने कहा कि सरकार की तरफ से आदेश आया है कि जो पक्के मकान ' प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत बनाए गए थे, उनका नए सिरे से आबंटन किया जाएगा। इस तरह सगुनी के मकान को किसी और के नाम पर आबंटित कर दिया गया।
   सगुनी ने मुखिया जी से बहुत मिन्नतें की मकान को बचाने की। कहा कि मुझे एक बार प्रधानमंत्री जी से मिलवा दीजिए। उन्होंने कहा था कि ' कोई तकलीफ होने पर मुझे बताना, मैं सेवा के लिए सदैव तत्पर रहूंगा '। उसे विश्वास था कि मंत्रीजी उसकी बात अवश्य सुनेंगे।
       मुखिया जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और कहा कि  'अरे सगुनी, कैसी बातें करती है? जिस वक़्त मंत्रीजी तुम्हारे घर आए थे वो चुनाव का समय था और उनकी बातें  ' चुनावी आश्वासन। ' क्या तुम्हें नहीं पता कि यह ' लोकतंत्र का चुनाव ' है जिसमें जनता को तरह-तरह के चुनावी वादों से प्रलोभन दिए जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद उसी जनता को हाशिये पर रख दिया जाता है।
         अब मंत्रीजी जो प्रधानमंत्री बन गए हैं उन्हें भला तुम और तुम्हारी भिंडी की सब्जी कहाँ याद होगी। तू भी भूल जा इस बात को।
                                              गीता चौबे
                                            रांची झारखंड

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