Tuesday, 30 April 2019

जूही की कली

🌷🌷🌷जूही की कली🌷🌷🌷
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खुबसूरत,अलमस्त,प्यारी सी
जूही की कली थी वो
सबकी दुलारी,सबकी प्यारी
सबकी लाडली थी वो
हरदम उसकी खिलखिलाहट गुंजा करती
पूरे बगिया की शान थी वो

एक दिन मस्त पवन का झोंका आया
कली के मन को वो बड़ा भाया
सुध-बुध खो बैठी वो
अपना दिल उसे दे बैठी वो
दिन-दुनिया भुल बैठे दोनों सब
एक दुसरे में खोये रहते दोनों हर वक्त

दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा
एक दिन अचानक वह चला गया
कली की सारी खुशियाँ छिन गयी
बिरह की ताप में वह जलने लगी

सभी दुःखी थे
बगिया बेरौनक थी
सिसकियाँ उसकी गुंजा करती
दिन रात बाट वह जोहा करती

कमसिन प्रिया की याद जब आयी
पवन था दूर अपने देश
उसे मिलन की याद आने लगी
विरह उसे भी सताने लगी
दूरी सहन कर न सका वो
बन कर झोंका फिर आ गया वो
झुम उठी वह मारे खुशी से
जूही की कली खिल गयी फिर से...

               रंजना वर्मा

1 comment:

runa said...

सुंदर रचना