Tuesday, 30 April 2019


पानी रे पानी...
पानी रे पानी! तेरी महिमा अपरंपार
तुझ बिन प्यासा रहे ये जग - संसार
तू तो एक अनमोल खज़ाना है जिसे
बचाने का हम करें गहराई से विचार
तेरी महिमा का मैं करूँ क्या बयान
न कोई रूप, न रंग फिर भी है महान
विधाता ने भी एक भाग ही थल और
तीन भाग जल का दिया है हमे दान
तेरी हर कशिश मैंने शिद्दत से जानी है
तेरी हर शक्ति को भी खूब पहचानी है
हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेती है
पात्र के अनुसार आकार बना लेती है
नारी और पानी की स्थिति एक जैसी है
हर रूप में ढलने की क्षमता भी एक जैसी है
कभी ' हया ' तो कभी मुख का ' पानी ' बनी
'पानी' सी बहते रहना नारी की जिंदगानी बनी
                                   गीता चौबे
                                रांची झारखंड



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