Thursday, 25 April 2019

लघु कथा : गलतफहमी की त्रासदी

        आज के अखबार के पहले पृष्ठ पर ही '' नारी मुक्ति विषय पर तेज प्रताप सिंह के जोरदार भाषण ने नारियों का दिल जीता '' लिखा देख कर सुधा की मुट्ठिया भींच गयीं। इसी गलतफहमी का शिकार हो कर उसने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली। अखबार हाथ में लिए वह निढाल सी बिस्तर पर लेट गयी और अपने अतीत में चली गयी...
        दो साल पहले ऐसे ही एक मंच पर नारी शोषण के विरुद्ध तेजप्रताप का भाषण सुन उसे अपना दिल दे बैठी थी। लड़का सुधा के माँ-बाप को भी जंच गया और दोनों की शादी हो गयी। सुधा बहुत खुश थी सुलझे हुए विचारों वाला पति पाकर। कुछ दिन मौज-मस्ती में बीतने के बाद सुधा ने नौकरी फिर से जॉइन करने की इच्छा पति के समक्ष रखी।
          यह सुनकर तेजप्रताप आगबबूला हो उठा, '' पागल हो गयी हो, किस चीज़ की कमी है जो बाहर मर्दों के बीच नौकरी करने जाओगी। '' सुधा अवाक रह गयी पति की बातें सुनकर।
बोली, '' यह क्या हो गया है तुम्हें? तुम तो नारी उद्धार के समर्थक थे। नारी के प्रति तुम्हारी सोच से ही तो मैं प्रभावित हुई थी। ''
   '' वो मेरा पेशा है, परंतु निजी तौर पर मैं स्त्रियों की स्वतंत्रता के बिल्कुल खिलाफ हूं। कान खोलकर सुन लो, तुम्हारी दुनिया सिर्फ यह चारदीवारी है, इसे लांघने की कोशिश मत करना... इसी में तुम्हारी भलाई है। ''
           निढाल सी सुधा सोच रही थी कि कभी-कभी गलतफहमियां जिंदगी को नासूर बना देती हैं।
                                    गीता चौबे
                                  रांची झारखंड

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