Thursday, 25 April 2019


लघुकथा : धर्म का पर्दा
    
        पूजा स्कूल से आते ही माँ के गले लिपट गयी और चहकते हुए बोली, '' माँ आज मेरे क्लास में एक नयी लड़की आयी...सकीना, बहुत प्यारी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी बन गयी। हम दोनों ने साथ मिल कर लंच किया। उसके लंच में परांठा था जो बहुत ही स्वादिष्ट था। ''
     ' सकीना? यह तो मुस्लिम नाम है, आज के बाद तुम उससे दोस्ती नहीं करोगी और न ही उसकी कोई चीज़ खाओगी।'' पूजा की माँ सविता ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए कहा।
  'पर क्यूँ माँ? वो तो बहुत अच्छी है और पढ़ाई में भी होशियार है। '
  'बेटा वो लोग मुस्लिम हैं और हम हिन्दू। हमारे धर्म अलग हैं... हमारा उनका कोई मेल नहीं। '
'यह धर्म क्या होता है माँ? सकीना तो बिल्कुल हमारे ही जैसी दिखती है.. वो हमसे अलग कैसे?'
   ' तुम नहीं मिलोगी उससे, बस इतना याद रखो.. हम हिंदू हैं और वो मुसलमान। '
   पूजा को तो चुप करा दिया पर उसके बालमन पर इसका क्या प्रभाव हुआ यह सविता न समझ सकी।
    कुछ दिनों बाद पूजा और सविता राशन लेने एक पन्सारी की दूकान पर गये जहाँ सकीना और उसकी माँ भी गेहूँ ले रही थीं। सविता के कहने पर दूकानदार ने उसी कनस्तर से गेहूँ तौलना शुरू किया जिसमें से उसने सकीना की माँ रूबीना को दिया था।
  ''  अरे अंकल! पूजा ने दूकानदार को टोकते हुए कहा, हमें ये वाला गेहूँ नहीं चाहिए, हमें तो आप हिंदू गेहूँ दीजिए। ''
   ''हिन्दू गेहूँ? बेटा गेहूँ हिंदू या मुसलमान नहीं होता। ''
'भगवान की बनायी कोई भी चीज़ हिंदू - मुस्लिम नहीं होती... इन नैसर्गिक चीज़ों का कोई धर्म नहीं होता। '
'पर माँ तो बोलती हैं कि सकीना का भोजन मुस्लिम है... है न माँ?'
  सविता पूजा के मासूम सवालों का कोई जवाब न दे पायी। वह सोचने पर मजबूर हो गयी कि जब भगवान ने कोई भेदभाव नहीं रखा तो वह क्यों इस कट्टर परंपरा का वहन कर रही है...
सविता की आंखों पर पड़ा धर्म का पर्दा हट चुका था और उसने पूजा और सकीना को गले से लगा लिया।
                                          गीता चौबे
                                         रांची झारखंड

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