Monday, 29 April 2019

कविता

रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं
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बरखा की तरह बरस गये
तुम्हारी बातों से सोंधी सोंधी
खुशबू आ रही थी
मेरी चाहत और जज़्बात सूखें हैं अभी भी
तुमने जाने की कैसे बात कह दी
रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं ...

बातों का सिलसिला बढ़ रहा था
दिल से दिल का मिलन था अभी बाकी
कुछ शिकायतें हमारी
कुछ शिकायतें तुम्हारी
दरम्यान हमारे थी अभी बाकी
तुमने जाने की कैसे बात कह दी अभी
रुक जाओ कि दिल भरा नहीं अभी ...

याद करो कैसे मिला करते थे हमदोनों
बात बात पर झगड़ते थे हमदोनों
फिर गलती भी मान लेते थे हमदोनों
ये कैसा फासला हो गया है
बीच हमारे दरम्यान
तुमने जाने की कैसे बात कह दी
रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं ....

                  रंजना वर्मा

1 comment:

संतोष सुधाकर said...

जज़्बात की खूबसूरत अभिव्यक्ति 👍