दिन का चौथा पहर,
अस्ताचल को जाता सूरज,
आसमान मे छिटपुट बादल,
घरों के बीच कुछ खाली जगह
जहाँ उगे नहीं कंक्रीट के जंगल अभी,
वनों की दलील पेश करतीं
कुछ हरी भरी झाड़ियां और पेड़
अब भी बचे हैं वहां।
झाड़ियों मे अनेक चिड़ियाँ,
चुगते फुदकते उड़ते फिर बैठते,
सहसा आसमान मे
एक हेलीकॉप्टर ने लगायी कई चक्करें,
कुछ चिडियाँ डरीं और फुर्र हुईं
पर कुछ दुबक गईं वहीं पेड़ पर।
एक चिड़े ने चिड़ी से कहा,
बाप रे! इतनी बड़ी चिड़िया!
चिड़ी ने मुँह बिचका लिया,
बड़ी, पर इतनी भी तमीज़ नहीं
कि नीचे बच्चे खेलते हैं, डर जाएंगे!
2 comments:
वाह! बहुत अच्छी रचना
वाह..... बहुत सुंदर
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