Saturday, 27 April 2019

चंचल मन
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ओ चंचल मन धीरज तू धर
क्यों विकल हुआ जाता प्रतिपल,
सीखो   चंचलता   नदियों   से,
बहती  उनकी  धाराओं  से।

चंचल लहरें बहती जाती पर
संयम  वो  ना  कभी  खोती,
हैं  वेग  भरी  लहरें  देखो
कैसे  सीमा  में  बँधी  हुई।

चंचलता इक आभूषण है,
रहती जब तक मर्यादा में।
मन चंचल तू कितना हो ले,
मर्यादा का तो स्मरण रहे।

मर्यादित बहती जब ये पवन,
शीतलता देती तन मन को।
बन जाती है तूफान कभी
होती जब अमर्यादित वो।

बहती नदिया, बहता ये पवन,
मन चंचल तू भी बहता जा।
चंचलता  जो  सीखी  इनसे,
सीखो  भी  इनसे  मर्यादा।
                                   रूणा रश्मि
                                राँची , झारखंड

1 comment:

संतोष सुधाकर said...

बहुत सुन्दर कविता, सुन्दर शब्द चयन, मर्यादा में ही खूबसूरती है ।