Tuesday, 30 April 2019

सुहाग की सेज


सुहाग की सेज...
'' ओए होए.. गुड्डो रानी, अकेले अकेले मुस्कुरा रही हो... जरा गाल तो देखो बन्नो के... शर्म से गुलाबी हुए जा रहे हैं.. '' कहती हुए प्रीति ने अपनी सखी गुंजन को छेड़ना शुरू कर दिया। गुंजन की शादी जो हो रही थी समीर के साथ। आज बारात आनेवाली थी। गुंजन इन्हीं मीठे सपनों में खोयी हुयी मुस्कुरा रही थी।
     '' सुन गुंजन, सुहागरात की सारी बातें मुझे बतानी है तुझे... कुछ भी छुपाया तो मैं कट्टी हो जाऊंगी तुझसे... '' प्रीति ने उसे चिकोटी काटते हुए छेड़ा।
   बड़ी भव्य बारात आयी और धूमधाम से गुंजन की शादी हो गयी। बड़े - बूढ़ों के ' सदा सुहागिन रहो ' का आशीर्वाद लेकर अपने नये जीवन के सुखद सपने सजाये गुंजन अपने ससुराल विदा हो गयी।
      गुंजन घूँघट किये हुए छुई-मुई-सी अपने सुहाग की सेज पर बैठी समीर का इंतज़ार कर रही थी। छोटी - सी आहट पर भी उसके दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। अचानक उसने शोरगुल की आवाज़ सुनी। रोने-चिल्लाने की आवाज आनी शुरू हो गयी। वह समझ नहीं पा रही थी कि माजरा क्या है? तभी उसकी ननद रोती हुयी आयी और बोली कि '' भाभी, भैया आपके लिए सुहागरात का तोहफ़ा लाने गये थे कि अचानक एक तेज गति से आती हुयी ट्रक ने उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। भाभी... भइया... हमें छोड़ गए...'' इसके साथ ही वह गुंजन को अपने बांहों में भर बुक्का फाड़ के रोने लगी।
        गुंजन पथराई आखों से अपने ' सुहाग की सेज ' को घूर रही थी...।
                                      गीता चौबे
                                     रांची झारखंड

यात्रा : एक संस्मरण


              यात्रा : एक संस्मरण                                    
              
               यात्रा.... एक रोमांचक अनुभव....
यात्रा..... एक अत्यंत ही रोमांचक अनुभव होती है मेरे लिए... साधन चाहे कोई भी हो, मेरे लिए यह हमेशा रोचक रहा है. कार यात्रा हो, बस यात्रा हो, ट्रेन यात्रा हो या विमान यात्रा हो...हमेशा  एक नए अनुभव का एहसास होता है और यूँ लगता है जैसे ये मेरी पहली यात्रा हो...
           इस बार की मेरी ये यात्रा ट्रेन की है.... यहां हमे 2 फीट चौड़ी और 6 फीट लंबी बर्थ (सीट) मिलती है... यात्रा चाहे 2 घंटे की हो या 2 दिनों की... उतने समय के लिए यही हमारी दुनिया होती है.... हमारी इच्छाएँ, आकांक्षाएं सब इसी के इर्द गिर्द सिमट जाती हैं... और हम बड़े आराम से (ये हमारी सोच पे निर्भर करता है) ये सीमित समय को व्यतीत करते हैं...
   इस यात्रा को हम गौर से और गहराई से देखें तो इससे हमे एक बड़ी सीख मिलती है, हमारे जीवन की बहुत बड़ी सच्चाई हमारे सामने आती है...
     मैं बड़े गौर से देख रही थी... 2 सीट आमने सामने... एक पर एक धनाढ्य बहुत ही अमीर व्यक्ति... दूसरे पर एक साधारण सा इंसान (इसका अंदाजा सिर्फ़ पहनावे से मुझे लगा)... ट्रेन के लिए, रेलवे स्टाफ़ के लिए दोनों एक समान.... दोनों के लिए एक जैसा कंबल, एक जैसी चादर, एक जैसा तकिया और एक जैसा खाना.... कहीं कोई विषमता नहीं... एक निश्चित समय तक के लिए दोनों का एक दूसरे के प्रति समान व्यवहार.... कहीं कोई विक्षेप नहीं..... प्रेम और भाईचारा का सतत् प्रवाह....
    इस दृश्य ने मुझे बहुत प्रभावित किया और मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि जब हमने अपने अहंकार को, अपनी रुतबे को थोड़ी देर के लिए ही सही दरकिनार कर दिया तो हमारा वो पल कितना सुखद, कितना खुशगवार रूप से व्यतीत हुआ... थोड़ी देर का सफर कितने आनंद से तय हुआ.... तो क्यूँ न हम इस टिप्स को अपने जीवन के सफर के लिए आजमाएं...
   हमारी ये जीवन यात्रा भी इसी तरह की है, है न? हमारे रचनाकार (भगवान्) ने हमे एक समान इस धरती पर भेजा... प्रकृति ने भी हमारे साथ एक सा व्यवहार किया... फिर हमारे बीच इतनी बड़ी खाई (अमीरी गरीबी की) क्यूँ और कैसे पैदा हो गई? ऊंच नीच का अंतर क्यूँ आ गया हमारे बीच?  किस बात का अहंकार पैदा हो गया हमारे अंदर?
   किसी न किसी रूप में हम सभी इस बात को महसूस कर रहे हैं, हमारे पास इसे समझने का विवेक भी है.... पर हम उसका उपयोग करना भूल गए हैं.... हम भूल गए हैं कि एक दिन हमारी यात्रा समाप्त होगी और हम मंजिल (वापस अपने रचनाकार भगवान्) पर पहुच जाएंगे.... हमारे ईश्वर के पूछने पर कि.. 'यात्रा कैसी रही.. सुखद? ' हम क्या जवाब देंगे...
   तो चलिए हम इसकी तैयारी कर लें.... अपनी जीवन यात्रा को  सुखद बनाने के लिए..... प्रेम, भाईचारा और सद्भावअना का समानता का आपस में संचार करें...
      हमारी जीवन यात्रा मंगलमय हो....
           इसी कामना के साथ..... 
                                           गीता चौबे 
                                         रांची झारखंड 

जूही की कली

🌷🌷🌷जूही की कली🌷🌷🌷
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खुबसूरत,अलमस्त,प्यारी सी
जूही की कली थी वो
सबकी दुलारी,सबकी प्यारी
सबकी लाडली थी वो
हरदम उसकी खिलखिलाहट गुंजा करती
पूरे बगिया की शान थी वो

एक दिन मस्त पवन का झोंका आया
कली के मन को वो बड़ा भाया
सुध-बुध खो बैठी वो
अपना दिल उसे दे बैठी वो
दिन-दुनिया भुल बैठे दोनों सब
एक दुसरे में खोये रहते दोनों हर वक्त

दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा
एक दिन अचानक वह चला गया
कली की सारी खुशियाँ छिन गयी
बिरह की ताप में वह जलने लगी

सभी दुःखी थे
बगिया बेरौनक थी
सिसकियाँ उसकी गुंजा करती
दिन रात बाट वह जोहा करती

कमसिन प्रिया की याद जब आयी
पवन था दूर अपने देश
उसे मिलन की याद आने लगी
विरह उसे भी सताने लगी
दूरी सहन कर न सका वो
बन कर झोंका फिर आ गया वो
झुम उठी वह मारे खुशी से
जूही की कली खिल गयी फिर से...

               रंजना वर्मा

सुहाग

कविता

सुहाग
******
तुम ही मेरे राग हो, अनुराग हो,
और मेरे सुहाग हो।
तुम ही मेरे प्यार हो, आधार हो
जीवन श्रृंगार हो।
जग ये भवसागर है,
जीवन एक नैया है।
मेरी इस नैया के
 तुम ही खेवनहार हो।
जीवन की बगिया में,
खुशबू से भरे हुए
फूलों की बहार हो।
तुमहीं दिलोजान हो
और मेरे प्राण हो।
ईश्वर से पाया जो,
वो इक वरदान हो।
खिल गया है दिल मेरा,
जबसे तुमको पाया है।
तेरा ये साथ ही
जीवन सरमाया है।
                      रूणा रश्मि

पानी रे पानी...
पानी रे पानी! तेरी महिमा अपरंपार
तुझ बिन प्यासा रहे ये जग - संसार
तू तो एक अनमोल खज़ाना है जिसे
बचाने का हम करें गहराई से विचार
तेरी महिमा का मैं करूँ क्या बयान
न कोई रूप, न रंग फिर भी है महान
विधाता ने भी एक भाग ही थल और
तीन भाग जल का दिया है हमे दान
तेरी हर कशिश मैंने शिद्दत से जानी है
तेरी हर शक्ति को भी खूब पहचानी है
हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेती है
पात्र के अनुसार आकार बना लेती है
नारी और पानी की स्थिति एक जैसी है
हर रूप में ढलने की क्षमता भी एक जैसी है
कभी ' हया ' तो कभी मुख का ' पानी ' बनी
'पानी' सी बहते रहना नारी की जिंदगानी बनी
                                   गीता चौबे
                                रांची झारखंड



कविता

××पानी रे पानी ××
------------------------
सूर्य प्रकट हुआ लिए प्रचंड रूप
बरस रहे आग के गोले
तीव्र हो गई उसकी धूप
धरती रही सुलग
नदी,तालाब गये सूख
जीव-जन्तु रहे तड़प
मानव कंठ भी गया सूख
चारों ओर घर और सड़क बन रहे
पर्वत-वृक्ष सब कट रहे
नाराज प्रकृति दिखा रही क्रोध
तैयार हो जाओ झेलने उसका प्रकोप
वक़्त है अभी भी संभल जाओ
बहुत किया दोहन,अब ठहर जाओ
पृथ्वी की सिसकी गुंज रही चारों ओर
पानी रे पानी
तू तो चला रसातल की ओर...

                       रंजना वर्मा
                    

लघुकथा

लघुकथा- सुहाग
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  उस दिन करवा चौथ था।सुरभि ने अपने अखंड सौभाग्य के लिए व्रत रखा था।वह बड़ी बेसब्री से अपने पति का इंतजार कर रही थी ।चाँद अभी निकलने ही वाला था ।दो दिन पहले ही उसके पति अमर एक बहुत ही खूबसूरत लाल रंग की साड़ी लेकर आये थे ।कहा,"इसे तुम करवा चौथ के दिन पहनना ।"सुरभि साड़ी पाकर बहुत खुश हो गई ।वह वही साड़ी पहनकर ,सोलह श्रृंगार कर अपने पति का इंतजार कर रही थी ।
          इधर उसके पति ऑफिस के काम से अक्सर शहर से बाहर जाने लगे थे।उसने एक दो बार टोका भी था।वह कहते थे-"तुम्हारे लिए ही तो कमा रहा हूँ ।मैं तुम्हें रानी की तरह से  रखना चाहता हूँ ।"यह सुनकर वह खुशी से फुली न समाती थीं ।
       अचानक फोन की घंटी बजी ।उसने दौड़ कर फोन उठाया ।उसे खबर मिली कि उसके पति का एक्सीडेंट हो गया है ।वह पागल सी बदहवास दौड़ते हुए उस स्थान पर पहुँची जहाँ एक्सीडेंट हुआ था ।वहाँ जाकर उसने जो देखा ,उसे देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई ।गाड़ी में उसके पति के साथ एक महिला भी घायल पड़ी थी।उस महिला ने भी वैसी ही साड़ी पहन रखी थी जैसी उसने।उसे पता चला कि उसके पति ऑफिस के काम के बहाने बाहर जाने के बजाय उस महिला के साथ रहते थे।उसे बड़ा धक्का लगा ।उसने जिस सुहाग के लिए आज निर्जला उपवास रखा था ,वही सुहाग उसे धोखा दे रहा था।
         
                           रंजना वर्मा

Monday, 29 April 2019

कविता

रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं
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बरखा की तरह बरस गये
तुम्हारी बातों से सोंधी सोंधी
खुशबू आ रही थी
मेरी चाहत और जज़्बात सूखें हैं अभी भी
तुमने जाने की कैसे बात कह दी
रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं ...

बातों का सिलसिला बढ़ रहा था
दिल से दिल का मिलन था अभी बाकी
कुछ शिकायतें हमारी
कुछ शिकायतें तुम्हारी
दरम्यान हमारे थी अभी बाकी
तुमने जाने की कैसे बात कह दी अभी
रुक जाओ कि दिल भरा नहीं अभी ...

याद करो कैसे मिला करते थे हमदोनों
बात बात पर झगड़ते थे हमदोनों
फिर गलती भी मान लेते थे हमदोनों
ये कैसा फासला हो गया है
बीच हमारे दरम्यान
तुमने जाने की कैसे बात कह दी
रुक जाओ कि अभी दिल भरा नहीं ....

                  रंजना वर्मा

Sunday, 28 April 2019

**एकांत के मोती***



पांडवों का स्वर्गारोहण

"यात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए। पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता तेजी से आगे चलने लगे। तभी द्रौपदी लडख़ड़ाकर गिर पड़ी।

द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी। युधिष्ठिर ने कहा कि- द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए। थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े।

भीमसेन ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था, इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है। कुछ देर बाद नकुल भी गिर पड़े। भीम के पूछने पर युधिष्ठिर ने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।

थोड़ी देर बाद अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीमसेन को बताया कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर अभिमान था। अर्जुन ने कहा था कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा, लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।

थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। जब भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण तो उन्होंने बताया कि तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।"

यह कहानी वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत देती है। हम सब ने जीवन मे कितनी ही परियोजनाएं साथ पूरी की हैंं। और अब अपनी अंतिम यात्रा पर साथ चल रहे हैं। रास्ते मे एक एक कर लोग गिरते जाएंगे और उसे पीछे छोड़ बाकी आगे बढ़ते जाएंगे। यही जीवन है और जीवन का रहस्य भी।
शुभरात्रि

Saturday, 27 April 2019

लघुकथा

           चाँदी का झुमका
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आज सीता की बड़ी बहन की नई-नवेली बहू की मुँह दिखाई की रस्म थी।सीता की दीदी की शादी बहुत ही अमीर घर में हुई थी।उसकी और उसकी दीदी की आर्थिक स्थिति  में बहुत फर्क था।जब उसकी दीदी ने अपने बड़े बेटे की शादी का निमंत्रण दिया तो वह बहुत परेशान हो गई ।वह मंहगा उपहार देने की स्थिति में नहीं थी।इसलिए वह वहाँ जाने से हिचकिचा रही थी।लेकिन उसकी बेटी ने कहा कि,"माँ मौसी ने तुम्हे इतने प्यार से तुम्हे बुलाया है तो तुम्हे वहाँ जरूर जाना चाहिए ।रही उपहार की बात तो,उपहार की कीमत नहीं,उसे कितने प्यार से  दिया जा रहा है वह देखना चाहिए ।
    दूसरे दिन उसकी बेटी ने उसे एक चाँदी का झुमका ला कर दिया ।झुमका में  रंग-बिरंगे चमकते नग जड़े हुए थे,जिससे झुमका बहुत ही प्यारा दिख रहा था ।झुमका देखकर सीता बहुत खुश हो गयी।
       दीदी की बहू की मुँह-दिखाई का रस्म शुरू हो गयी ।एक से बढ़कर एक गहनों के साथ अमीरी का नुमाईश शुरू हो गयी।कोई हीरों का सेट दे रहा था तो कोई जड़ाऊ ।सारे गहने एक से बढ़ कर एक थे।सीता का दिल बैठा जा रहा था ।इतने कीमती गहनों के बीच कैसे वह सस्ता सा चाँदी का झुमका दे।शर्म के मारे उसने झुमके को अपने पर्स में डाल दिया ।
        अचानक हल्ला शुरू हो गया।बहू का एक हीरों का हार नहीं मिल रहा था ।तभी दीदी की एक रिश्तेदार ने कहा कि उसने सीता को कुछ पर्स में डालते हुए देखा है ।अपमान से सीता की आँखे भर आयी।तभी दीदी की जेठानी उठी और उसके हाथ से पर्स छिन लिया ।फिर पर्स खोल कर उसे उलट दिया ।चाँदी का झुमका पर्स से निकल कर जमीन पर गिर गया ।सभी  स्तब्ध रह गये।
        जमीन पर पड़े चाँदी के झुमके के रंग-बिरंगे नग चमक रहे थे और सीता की आँखों के आँसू उसे प्रतिस्पर्धा दे रहे थे।

                रंजना वर्मा
httअच्छा किया  ...

अच्छा किया जो तुमने साथ छोड़ा,
मेरी आसमां में उड़ने की चाह न थी
तुम्हें जमीं भाता न था ।
मुझे सूर्य की लालिमा अच्छी लगती,
तुम्हें सुबह उठना ही नागवार गुजरता।
पछी का कलरव मुझे अच्छा लगता,
लेकिन उस शोर से तुम्हें सिर दर्द ।
तुम्हें छुट्टियों में पहाड़ खींचता,
 मुझे अपने  गांव के खेत।
घर का खाना ही मुझे अच्छा लगता,
तुम्हें होटल के एंबियंस।
गपशप कर जिससे मैं खुश रहता, वो तुम्हें गवांर लगते।
फिर भी हम कितने दिन साथ रहे,
तुमने भी कोशिश कम न की,
कसर हमने भी कोई  न छोड़ी,
  लेकिन विचार मिल न ही पाए।
ऐसा न था कि साथ अच्छा न लगता,
लेकिन मन पे लगाम लगा ही रहता।
तुमने ही तो हिम्मत दिखाई,
मैं तो कमजोर ही निकला।
तुम्हारी यही निर्णय की क्षमता,
मुझे अभिभूत कर जाता।
ना गिला ना शिकवा,
 हां याद  तो आओगी ही
लेकिन तुम भी अपने रह चलो,
मैं भी अपने पथ,
ना तो कोई बंधन हो ना ही कोई संतप्त।
                                     राजीव, रांची।
चंचल मन
********
ओ चंचल मन धीरज तू धर
क्यों विकल हुआ जाता प्रतिपल,
सीखो   चंचलता   नदियों   से,
बहती  उनकी  धाराओं  से।

चंचल लहरें बहती जाती पर
संयम  वो  ना  कभी  खोती,
हैं  वेग  भरी  लहरें  देखो
कैसे  सीमा  में  बँधी  हुई।

चंचलता इक आभूषण है,
रहती जब तक मर्यादा में।
मन चंचल तू कितना हो ले,
मर्यादा का तो स्मरण रहे।

मर्यादित बहती जब ये पवन,
शीतलता देती तन मन को।
बन जाती है तूफान कभी
होती जब अमर्यादित वो।

बहती नदिया, बहता ये पवन,
मन चंचल तू भी बहता जा।
चंचलता  जो  सीखी  इनसे,
सीखो  भी  इनसे  मर्यादा।
                                   रूणा रश्मि
                                राँची , झारखंड

             मतदान तो जरूरी है
चुनाव और मतदान
एक दूसरे का पूरक जान
                  चुनाव राजनेताओं का हक
                  मतदान मतदाताओं का हक
लोकतंत्र में जनता बेगम
जनता की शक्ति नहीं है कम
                 मत का हथियार उठायें हम
                 समझ बुझ उसे चलायें हम
जो भी सच्चा औ मेहनती होगा
हमारे मत का अधिकारी होगा
                 लोभ मोह से ऊपर उठकर
                 करें मतदान सोच समझकर
मत के मूल्य की पहचान करें
अपने हिस्से का हम काम करें
                  मतदान केंद्र की चाहे कितनी भी दूरी है
                  देश की खातिर तो ये मतदान जरूरी है
                                  गीता चौबे
                                G 4 A
                       Green Garden Apartment
                     Hesag Hatia, Ranchi, Jharkhand

बड़ी चिड़िया


दिन का चौथा पहर,
अस्ताचल को जाता सूरज,
आसमान मे छिटपुट बादल,
घरों के बीच कुछ खाली जगह
जहाँ उगे नहीं कंक्रीट के जंगल अभी,
वनों की दलील पेश करतीं
कुछ हरी भरी झाड़ियां और पेड़
अब भी बचे हैं वहां।
झाड़ियों मे अनेक चिड़ियाँ,
चुगते फुदकते उड़ते फिर बैठते,
सहसा आसमान मे
एक हेलीकॉप्टर ने लगायी कई चक्करें,
कुछ चिडियाँ डरीं और फुर्र हुईं
पर कुछ दुबक गईं वहीं पेड़ पर।
एक चिड़े ने चिड़ी से कहा,
बाप रे! इतनी बड़ी चिड़िया!
चिड़ी ने मुँह बिचका लिया,
बड़ी, पर इतनी भी तमीज़ नहीं
कि नीचे बच्चे खेलते हैं, डर जाएंगे!

Friday, 26 April 2019

उन्मुक्त लघुकथा



                                     TRAIL

उन्मुक्त लघुकथा के इस संस्करण में आपकी रचना शामिल की गई है ।


1.               अंतिम संस्कार
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        मीरा बहुत बीमार थी।उसे पेट में असहनीय पीड़ा हो रही थी।डाक्टर ऑपरेशन करने को कह रहे थे ।उसका पति खाट पर लेटा हुआ खर्चा का हिसाब लगा रहा था ।ऑपरेशन का खर्चा  , अस्पताल का खर्चा,दवाई सब मिलाकर पचास हजार से ज्यादा हो रहा था ।बीमारी में पहले ही बहुत खर्चा हो चुका था ।कहाँ से लाये वह इतना पैसा? लेटे लेटे उसकी निगाह अपनी झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अपनी झोपड़ी बेच देते हैं ।'वह बोला ।
    'नहीं!बिलकुल नहीं ।एक छत ही तो है हमारे पास ।मैं तुम्हें और बच्चों को बेघर नहीं होने दूँगी ।भले ही मेरी जान क्यों न चली जाये ।'मीरा बोल पड़ी।
       सचमुच बिना इलाज के मीरा चल बसी।रघु पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा ।अब वह मीरा के अंतिम संस्कार के खर्चों का हिसाब कर रहा था ।दाह-संस्कार, पंडितों के खर्चे,भाई-बंधुओं को खिलाना  -कुल खर्चा पचास हजार से ज्यादा हो रहे थे।उसकी नजर फिर झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अंतिम संस्कार तो करना ही पड़ेगा ।झोपड़ी बेच देता हूँ ।'वह सोच रहा था ,काश उसने पहले ही अपनी झोपड़ी बेच दी होती तो मीरा आज जिन्दा होती।

                        रंजना वर्मा

2.   धर्म का पर्दा
     
        पूजा स्कूल से आते ही माँ के गले लिपट गयी और चहकते हुए बोली, '' माँ आज मेरे क्लास में एक नयी लड़की आयी...सकीना, बहुत प्यारी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी बन गयी। हम दोनों ने साथ मिल कर लंच किया। उसके लंच में परांठा था जो बहुत ही स्वादिष्ट था। ''
     ' सकीना? यह तो मुस्लिम नाम है, आज के बाद तुम उससे दोस्ती नहीं करोगी और न ही उसकी कोई चीज़ खाओगी।'' पूजा की माँ सविता ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए कहा।
  'पर क्यूँ माँ? वो तो बहुत अच्छी है और पढ़ाई में भी होशियार है। '
  'बेटा वो लोग मुस्लिम हैं और हम हिन्दू। हमारे धर्म अलग हैं... हमारा उनका कोई मेल नहीं। '
'यह धर्म क्या होता है माँ? सकीना तो बिल्कुल हमारे ही जैसी दिखती है.. वो हमसे अलग कैसे?'
   ' तुम नहीं मिलोगी उससे, बस इतना याद रखो.. हम हिंदू हैं और वो मुसलमान। '
   पूजा को तो चुप करा दिया पर उसके बालमन पर इसका क्या प्रभाव हुआ यह सविता न समझ सकी।
    कुछ दिनों बाद पूजा और सविता राशन लेने एक पन्सारी की दूकान पर गये जहाँ सकीना और उसकी माँ भी गेहूँ ले रही थीं। सविता के कहने पर दूकानदार ने उसी कनस्तर से गेहूँ तौलना शुरू किया जिसमें से उसने सकीना की माँ रूबीना को दिया था।
  ''  अरे अंकल! पूजा ने दूकानदार को टोकते हुए कहा, हमें ये वाला गेहूँ नहीं चाहिए, हमें तो आप हिंदू गेहूँ दीजिए। ''
   ''हिन्दू गेहूँ? बेटा गेहूँ हिंदू या मुसलमान नहीं होता। ''
'भगवान की बनायी कोई भी चीज़ हिंदू - मुस्लिम नहीं होती... इन नैसर्गिक चीज़ों का कोई धर्म नहीं होता। '
'पर माँ तो बोलती हैं कि सकीना का भोजन मुस्लिम है... है न माँ?'
  सविता पूजा के मासूम सवालों का कोई जवाब न दे पायी। वह सोचने पर मजबूर हो गयी कि जब भगवान ने कोई भेदभाव नहीं रखा तो वह क्यों इस कट्टर परंपरा का वहन कर रही है...
सविता की आंखों पर पड़ा धर्म का पर्दा हट चुका था और उसने पूजा और सकीना को गले से लगा लिया।
                                          गीता चौबे
                                         रांची झारखंड



3.   लुटी सी खुशी
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सरला और समीर का इकलौता पुत्र था क्षितिज। शादी के कई सालों के बाद कितने ही इलाज और मन्नतों के पश्चात उन्हें इस पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। बड़े ही नाजों से पाला था उन्होंने अपने लाडले को। यथासंभव जीवन की सारी खुशियाँ प्रदान की। अपने जीवन के एकमात्र सहारे के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने अपने वर्तमान की भी परवाह नहीं की।
                         क्षितिज भी बहुत ही होशियार, समझदार और अत्यंत संस्कारी लड़का था। किन्तु जब उच्च शिक्षा के लिए उसने विदेश जाने की इच्छा जाहिर की तब थोड़ी झिझक के बाद सरला और समीर दोनों मान गए थे। अपने पुत्रमोह को वे  क्षितिज की उड़ान में बाधक नहीं बनाना चाहते थे। शिक्षापूर्ति के पश्चात क्षितिज के घर वापसी के लिए वे पूर्णतया आश्वस्त थे।
                     पढ़ाई पूर्ण करके दो वर्षों के पश्चात  क्षितिज वापस आने वाला था। उच्च शिक्षा और एक बेहतरीन नौकरी के साथ आने वाले अपने पुत्र के स्वागत की तैयारियों में वे दोनों व्यस्त हो गए थे। उससे मिलने और साथ साथ रहने के खयाल से ही दोनों पुलकित हुए जा रहे थे।
          आखिर इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं।बड़े ही हर्षोल्लास से माता पिता दोनों ने अपने लाडले का स्वागत किया। रात को जब सभी साथ साथ भोजन कर रहे थे तभी अचानक एक विस्फोट की तरह ही क्षितिज ने अपने मन की बात माता पिता को बताई। दरअसल क्षितिज को उसकी योग्यतानुसार ही किसी बड़ी विदेशी कंपनी में मनवांछित नौकरी मिल गई थी और क्षितिज ऐसा मौका गँवाना नहीं चाहता था। उसके वापस विदेश जाने और वहीं नौकरी करने की बात सुन दोनों हतप्रभ थे।
                           दो दिनों के बाद ही क्षितिज की वापसी थी। इन दो दिनों में अपने माता पिता की सुविधाओं की पूरी व्यवस्था कर क्षितिज जल्द ही वापस आने का आश्वासन देकर विदेश चला गया।समीर और सरला अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी लुटी हुई खुशियों को जाते देख रहे थे और समझ नहीं पा रहे थे कि पुत्र की इतनी बड़ी उपलब्धि की खुशी मनाएं या उसका अपने से दूर जाने का गम।
                                       रूणा रश्मि
                                     राँची , झारखंड

लघुकथा

×××××अंतिम संस्कार ×××××
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मीरा बहुत बीमार थी।उसे पेट में असहनीय पीड़ा हो रही थी।डाक्टर ऑपरेशन करने को कह रहे थे ।उसका पति खाट पर लेटा हुआ खर्चा का हिसाब लगा रहा था ।ऑपरेशन का खर्चा  , अस्पताल का खर्चा,दवाई सब मिलाकर पचास हजार से ज्यादा हो रहा था ।बीमारी में पहले ही बहुत खर्चा हो चुका था ।कहाँ से लाये वह इतना पैसा? लेटे लेटे उसकी निगाह अपनी झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अपनी झोपड़ी बेच देते हैं ।'वह बोला ।
    'नहीं!बिलकुल नहीं ।एक छत ही तो है हमारे पास ।मैं तुम्हें और बच्चों को बेघर नहीं होने दूँगी ।भले ही मेरी जान क्यों न चली जाये ।'मीरा बोल पड़ी।
       सचमुच बिना इलाज के मीरा चल बसी।रघु पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा ।अब वह मीरा के अंतिम संस्कार के खर्चों का हिसाब कर रहा था ।दाह-संस्कार, पंडितों के खर्चे,भाई-बंधुओं को खिलाना  -कुल खर्चा पचास हजार से ज्यादा हो रहे थे।उसकी नजर फिर झोपड़ी की छत की ओर गयी।'अंतिम संस्कार तो करना ही पड़ेगा ।झोपड़ी बेच देता हूँ ।'वह सोच रहा था ,काश उसने पहले ही अपनी झोपड़ी बेच दी होती तो मीरा आज जिन्दा होती।

                        रंजना वर्मा

Thursday, 25 April 2019


लघुकथा : धर्म का पर्दा
    
        पूजा स्कूल से आते ही माँ के गले लिपट गयी और चहकते हुए बोली, '' माँ आज मेरे क्लास में एक नयी लड़की आयी...सकीना, बहुत प्यारी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी बन गयी। हम दोनों ने साथ मिल कर लंच किया। उसके लंच में परांठा था जो बहुत ही स्वादिष्ट था। ''
     ' सकीना? यह तो मुस्लिम नाम है, आज के बाद तुम उससे दोस्ती नहीं करोगी और न ही उसकी कोई चीज़ खाओगी।'' पूजा की माँ सविता ने तुगलकी फरमान जारी करते हुए कहा।
  'पर क्यूँ माँ? वो तो बहुत अच्छी है और पढ़ाई में भी होशियार है। '
  'बेटा वो लोग मुस्लिम हैं और हम हिन्दू। हमारे धर्म अलग हैं... हमारा उनका कोई मेल नहीं। '
'यह धर्म क्या होता है माँ? सकीना तो बिल्कुल हमारे ही जैसी दिखती है.. वो हमसे अलग कैसे?'
   ' तुम नहीं मिलोगी उससे, बस इतना याद रखो.. हम हिंदू हैं और वो मुसलमान। '
   पूजा को तो चुप करा दिया पर उसके बालमन पर इसका क्या प्रभाव हुआ यह सविता न समझ सकी।
    कुछ दिनों बाद पूजा और सविता राशन लेने एक पन्सारी की दूकान पर गये जहाँ सकीना और उसकी माँ भी गेहूँ ले रही थीं। सविता के कहने पर दूकानदार ने उसी कनस्तर से गेहूँ तौलना शुरू किया जिसमें से उसने सकीना की माँ रूबीना को दिया था।
  ''  अरे अंकल! पूजा ने दूकानदार को टोकते हुए कहा, हमें ये वाला गेहूँ नहीं चाहिए, हमें तो आप हिंदू गेहूँ दीजिए। ''
   ''हिन्दू गेहूँ? बेटा गेहूँ हिंदू या मुसलमान नहीं होता। ''
'भगवान की बनायी कोई भी चीज़ हिंदू - मुस्लिम नहीं होती... इन नैसर्गिक चीज़ों का कोई धर्म नहीं होता। '
'पर माँ तो बोलती हैं कि सकीना का भोजन मुस्लिम है... है न माँ?'
  सविता पूजा के मासूम सवालों का कोई जवाब न दे पायी। वह सोचने पर मजबूर हो गयी कि जब भगवान ने कोई भेदभाव नहीं रखा तो वह क्यों इस कट्टर परंपरा का वहन कर रही है...
सविता की आंखों पर पड़ा धर्म का पर्दा हट चुका था और उसने पूजा और सकीना को गले से लगा लिया।
                                          गीता चौबे
                                         रांची झारखंड

लघु कथा : गलतफहमी की त्रासदी

        आज के अखबार के पहले पृष्ठ पर ही '' नारी मुक्ति विषय पर तेज प्रताप सिंह के जोरदार भाषण ने नारियों का दिल जीता '' लिखा देख कर सुधा की मुट्ठिया भींच गयीं। इसी गलतफहमी का शिकार हो कर उसने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली। अखबार हाथ में लिए वह निढाल सी बिस्तर पर लेट गयी और अपने अतीत में चली गयी...
        दो साल पहले ऐसे ही एक मंच पर नारी शोषण के विरुद्ध तेजप्रताप का भाषण सुन उसे अपना दिल दे बैठी थी। लड़का सुधा के माँ-बाप को भी जंच गया और दोनों की शादी हो गयी। सुधा बहुत खुश थी सुलझे हुए विचारों वाला पति पाकर। कुछ दिन मौज-मस्ती में बीतने के बाद सुधा ने नौकरी फिर से जॉइन करने की इच्छा पति के समक्ष रखी।
          यह सुनकर तेजप्रताप आगबबूला हो उठा, '' पागल हो गयी हो, किस चीज़ की कमी है जो बाहर मर्दों के बीच नौकरी करने जाओगी। '' सुधा अवाक रह गयी पति की बातें सुनकर।
बोली, '' यह क्या हो गया है तुम्हें? तुम तो नारी उद्धार के समर्थक थे। नारी के प्रति तुम्हारी सोच से ही तो मैं प्रभावित हुई थी। ''
   '' वो मेरा पेशा है, परंतु निजी तौर पर मैं स्त्रियों की स्वतंत्रता के बिल्कुल खिलाफ हूं। कान खोलकर सुन लो, तुम्हारी दुनिया सिर्फ यह चारदीवारी है, इसे लांघने की कोशिश मत करना... इसी में तुम्हारी भलाई है। ''
           निढाल सी सुधा सोच रही थी कि कभी-कभी गलतफहमियां जिंदगी को नासूर बना देती हैं।
                                    गीता चौबे
                                  रांची झारखंड

लघुकथा

लघुकथा-

       🌹🌹*गलतफहमी *🌹🌹
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नंदनी अपने घर को सजाने में व्यस्त थी।आज रोहित अपने माता पिता के साथ उसके घर आने वाला था ।कल जब वह खाना बना रही थी,तभी उसकी बेटी रिया ने आकर उससे कहा कि, वह रोहित से प्यार करती है ।उसके माता पिता आप लोगों से मिलना चाहते हैं ।आरम्भ में उसके पति इस रिश्ते से खुश नहीं थे।लेकिन नंदनी ने अपने पति को मना लिया था।बेटी रिया के खुशी से चमकते चेहरे को देखकर उसे बहुत खुशी हो रही थी।
    अचानक नंदनी को पच्चीस साल पुरानी अपनी कहानी याद आने लगी ।वह भी मनु नाम के एक लड़के से  प्यार करती थी।दोनों को एक दूसरे का साथ बहुत पसंद था।दोनों घंटों एक दूसरे से बातें किया करते थे ।लेकिन दोनों ने अभी तक अपने प्यार का इजहार नहीं किया था ।घर में नंदनी की शादी की बातें चल रही थी।एक दिन एकांत पाकर नंदनी ने अपनी माँ  से अपने प्यार के बारे में बताया ।वह बोली,वह मनु से शादी करना चाहती है ।अभी माँ कुछ बोलती कि उसके दोनों भाई वहाँ आ गये।दोनों भाइयों का गुस्सा सातवें आसमान पर था ।दोनों ने कहा कि वह मनु से दूर रहे,नहीं तो वे दोनों मनु को जान से मार डालेंगे ।नंदनी डर गयी।
     अगले दिन मनु नंदनी के पास आया ।उसके हाथों में एक लाल गुलाब था ।उसने लाल गुलाब देते हुए अपने प्यार का इजहार किया ।और कहा,'क्या तुम मुझसे शादी करोगी? अपने भाईयों के कारण नंदनी अंदर से बहुत भयभीत थी ।लेकिन ऊपर से वह हंसते हुए बोली,'तुम गलतफहमी में हो मनु ।मैं तुम से प्यार नहीं करती ।हम सिर्फ दोस्त हैं ।इस दोस्ती को बदनाम मत करो।'मनु को बड़ा सदमा लगा ।वह उसी समय वहाँ से  चला गया और फिर उससे कभी नहीं मिला ।
   "माँ रोहित के माता-पिता आ गये है ।"रिया ने कहा ।नंदनी उनके स्वागत के लिए आग बढ़ी।लेकिन उसके कदम वहीं थम गये।रोहित के पिता और कोई नहीं मनु था।वह हाथ जोड़ कर खड़ी थी।मनु कह रहा था,"रिया बेटा तुम्हे  पूरा यकीन है न कि तुम रोहित से प्यार करती हो।कहीं ये तुम्हारा गलतफहमी तो नहीं ।"
        नंदनी की आँखों में आँसू भरे थे ।पर उसे संतोष था कि जो खुशी उसकी माँ ने उसे नहीं दिया था ,वो खुशी उसने अपनी बेटी  को दी।
   
                 रंजना वर्मा

Wednesday, 24 April 2019

छायावाद के स्तंभ    कवि जयशंकर प्रसाद
जन्म    30 जनवरी 1889
मृत्यु     15 नवंबर 1937
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कवि एक बहुत ही महान थे वो
हिंदी साहित्य का मान थे वो

थे काल कई इस काव्य जगत में
आया था जब आधुनिक काल
शैली भी थी कई और उसमें
थी इक शैली छायावाद।

इस के ही महान् स्तम्भ थे
वो थे जयशंकर प्रसाद
थे वो कवि और उपान्यासकार
कथाकार संग नाटककार।

भावों की गहराई हो या
हो प्रकृति की सुंदरता
सामाजिक वेदना में भी
अभिव्यक्ति की थी कुशलता।

कठिन परिस्थिति आई फिर भी
रोक ना पाई थी प्रतिभा
राष्ट्रप्रेम का काव्य रचा और
बने महान वो रचयिता।
                            रूणा रश्मि
                         राँची , झारखंड
जाल या बेड़ियाँ
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इस जाल रूपी व्यूह में फँस के रहेंगे
हम यूँही,
मजबूर हैं लाचार हैं, इसे भेद सकते
हैं नहीं।
ध्यान रखा था यही अपनी खुशी को
 वार कर,
आए ना कोई भी विपत्ति अब मेरे
परिवार पर।
ये भूलकर चाहत थी क्या, खुशियाँ हमारी
किसमें थीं,
हम बस वही करते गए सबकी भलाई
जिसमें थी।
पाया बहुत था प्यार भी सम्मान भी और
मान भी,
पर भूलते कैसे कि अपनी भी तो कुछ
पहचान थी।
उस निज को अब कुछ जानने पहचानने की
चाह में,
बढ़ चले हैं हम तो अब इस नव डगर नव
राह में।
देखते हैं होगा क्या अंजाम और हासिल
भी क्या,
बेड़ियों के संग ही पा सकते हैं अब मंजिल
भी क्या।
                                        रूणा रश्मि
                                    राँची , झारखंड

लोकतंत्र का चुनाव


लोकतंत्र का चुनाव

    आज सुबह से सगुनी बहुत खुश थी। आज उसके पांव जमीन पर नहीं थे। आज मंत्रीजी उसके घर आनेवाले थे। सगुनी एक दलित महिला थी जो मैला ढोने का काम करती थी। समाज के ऊँचे तबके की औरतें उससे घृणा करती थी।
               सगुनी ने अपने दो कमरों के पक्के मकान को जो ' प्रधान मंत्री आवास योजना ' के अंतर्गत उसे मिला था, अच्छे से साफ सुथरा कर चमका दिया था। पुराने बक्से में सहेज कर रखे गए गुदड़ी को झाड़ कर अपनी टूटी हुई खाट पर करीने से बिछा दिया था। मंत्री जी को उसपर बैठाना जो था।
              हारी - बीमारी के लिए थोड़े से पैसे बचा के रखे थे उससे थोड़ी सी भिंडी खरीद के लाई। साथ में थोड़ी गुड की डली भी ले लिया। बड़े प्यार से उसने भिंडी की सब्जी और रोटी बनाई।
            समय पर मंत्रीजी पधारे। सगुनी के घर के आसपास लोगों की भीड़ लग गई थी, उसमें गाँव के मुखिया जी सबसे आगे थे और ऊँचे तबके की वही संभ्रांत महिलाएं जो सगुनी को देख नाक - भौं सिकोड़ती थी, आज उसके भाग्य से ईर्ष्या कर रही थीं। सबकी जुबान पर सगुनी का ही नाम था।
   जैसे ही मंत्रीजी ने सगुनी के घर में कदम रखा, उसने मंत्रीजी को माला पहनाई और उनके पैर छुए। मंत्रीजी ने भी दिल खोलकर आशीर्वाद दिया। सगुनी ने बड़े प्यार से भिंडी की सब्जी और रोटी मंत्रीजी के सामने परोसी। मंत्रीजी ने भी बड़े चाव से भोजन किया और अंत में गुड़ खाकर शीतल जल पिया।
  अपने शब्दों में गुड़ सी मिठास लाते हुए सगुनी से कहा, '' कोई भी तकलीफ हो तो मुझे बताना, मैं जनता की सेवा के लिए सदा तत्पर रहूंगा। '' सगुनी मंत्रीजी के इस आश्वासन से अभिभूत हो गई।
   अगले दिन टीवी और अखबार में यही खबर छायी रही, '' मंत्रीजी ने दलित के घर भोजन किया '' गर्रीबों के सच्चे हमदर्द ''। सबकी नज़र में मंत्रीजी की छवि '' दलितों और गरीबों के मसीहा '' के रूप में उभरकर सामने आई।
         कुछ ही दिनों बाद लोकसभा का चुनाव हुआ। मंत्रीजी भारी मतों से विजयी हुए। और इसबार सत्तारूढ़ सरकार के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए।
सगुनी बहुत खुश थी कि जिन्हें अपनी थाली में भोजन कराया वो आज प्रधानमंत्री बन गए।
     एक दिन सगुनी के गाँव के मुखिया ने कहा कि सरकार की तरफ से आदेश आया है कि जो पक्के मकान ' प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत बनाए गए थे, उनका नए सिरे से आबंटन किया जाएगा। इस तरह सगुनी के मकान को किसी और के नाम पर आबंटित कर दिया गया।
   सगुनी ने मुखिया जी से बहुत मिन्नतें की मकान को बचाने की। कहा कि मुझे एक बार प्रधानमंत्री जी से मिलवा दीजिए। उन्होंने कहा था कि ' कोई तकलीफ होने पर मुझे बताना, मैं सेवा के लिए सदैव तत्पर रहूंगा '। उसे विश्वास था कि मंत्रीजी उसकी बात अवश्य सुनेंगे।
       मुखिया जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और कहा कि  'अरे सगुनी, कैसी बातें करती है? जिस वक़्त मंत्रीजी तुम्हारे घर आए थे वो चुनाव का समय था और उनकी बातें  ' चुनावी आश्वासन। ' क्या तुम्हें नहीं पता कि यह ' लोकतंत्र का चुनाव ' है जिसमें जनता को तरह-तरह के चुनावी वादों से प्रलोभन दिए जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद उसी जनता को हाशिये पर रख दिया जाता है।
         अब मंत्रीजी जो प्रधानमंत्री बन गए हैं उन्हें भला तुम और तुम्हारी भिंडी की सब्जी कहाँ याद होगी। तू भी भूल जा इस बात को।
                                              गीता चौबे
                                            रांची झारखंड

कविता

दिल धड़कता है अभी भी
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दिल धड़कता है अभी भी
बोझ उठाते हैं हाथ अभी भी
पांव थिरकते है अभी भी
सपने हसीं हैं अभी भी
मैं जवां हूँ अभी भी

तो क्या हुआ जो देख लिया मैंने
बहार जिन्दगी के कई
तो क्या हुआ जो देख लिया मैंने
रंग दुनिया के कई
कई रंग अनजाने है अभी भी
कई सपने अधूरे हैं अभी भी
मैं जवां हूँ अभी भी

सूरज रोज लेकर आता है
किरणें नई
दिन रोज लेकर आता है
उम्मीदें नई
दिल में कुछ खास करने की चाहत है अभी भी
कुछ और जीने की तमन्ना  है अभी भी
मैं जवां हूँ अभी भी

कितने लोग जुदा हो गये हमसे
कितने लोग जुड़ गए हम से
जाने वालों की याद है दिल में  अभी भी
कुछ और लोगों को बसाना है  दिल में  अभी भी
दिल धडकता है अभी भी
मैं जवां हूँ अभी भी

                 रंजना वर्मा
               राँची,झारखंड

लघु कविता

बाजार
××××××

ये दुनिया एक बाजार है
यहाँ बेच रहा हर शख्स
अपना सामान है
यहाँ तन बिकता है
मन बिकता है
बिकता इंसान का ईमान भी है
पशु हो या इंसान
सबकी एक किमत है
बोली लग रही है और
चौराहे पर खड़ा इंसान है
तरह तरह के गोश्त
भरे पड़े हैं बाजार में
गोश्त देख कर
लार टपकाते लोग
कसाई खड़े है बाजार में
किमत लगाते लोग
हर चीज बेचने को तैयार
हर चीज़ खरीदने को तैयार
स्वार्थ का मेला है
लोग हैं बेहरूपिये के वेश में
मन घबराता है
जिन्दगी के  इस बाजार में
     
             रंजना वर्मा

नर और नारी की तुलना क्यूँ..


नर और नारी की तुलना क्यूँ?

जाने कितनी व्यथाएं  नारी सहती रही हैं
जाने कितनी कथाएं इनकी अनकही रही हैं

चाहे कल की नारी या आज की नारी हो
हर युग में रही है हरदम पुरुषों पे भारी वो

एक महिला से कैसे पुरुष तुलना कर पाएगा
कितना भी कर ले तरक्की,नहीं महिला बन पाएगा

करें ही क्यूँ तुलना हम नारी और नर की
बड़े बेतुके विचार हैं ये, बातें हैं बे पर की

ईश्वर ने बनाया उन्हें बिल्कुल अलग अलग है
नर और नारी की संरचना भी तो बिलग है

नर में जो नारी खोजे, कितने बड़े मूरख हैं वो
हां इतना जरूर है कि एक दूसरे के पूरक हैं वो

मिले जुले काम हैं पुरुष और नारी के
मिल के चलें जैसे पहिए किसी गाड़ी के

अपने अपने तरीके से दोनों करें राज
अपनी अपनी समझ से दोनों करें काज

न शि‍कवा हो कोई , ना हो कोई गिला
दोनों के सहयोग से चले जीवन का सिलसिला
                                गीता चौबे
                               रांची झारखंड

जिंदगी क्या है

           जिंदगी क्या है
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बीती हुई बातों की
जिंदगी एक किताब है,
आने वाले वक्त का
शायद इक एहसास है।
खुशी के पलों में
जिंदगी उल्लास है,
गम के गर साये हों
जिंदगी उदास है।
वक्त के साथ जो बढ़ना है
जिंदगी इक दौड़ है।
सबसे आगे जो निकलना हो
तो ये इक होड़ है।
दौड़ते ही रहना है इसलिएै
जिंदगी रफ्तार है,
अगर कहीं ठहरो तो
भीड़ की कतार है।
छूने की कोशिश करें तो
है ये इक चंचल तितली,
बहने को गर छोड़ दें तो
बनती है ये मनचली।
ईश्वर के हाथों की
कठपुतली है जिंदगी
गर श्रद्धा हो ईश्वर में
तो है ये इक बंदगी।
देखो तो जिंदगी के
अनगिनत रूप हैं,
भावना हो जैसी
इसका वैसा ही स्वरूप है।
                     रूणा रश्मि

Tuesday, 23 April 2019

कहानी--- जादूगर अंकल






उठना है तुमको

                             उठना है तुमको

उठना है तुमको, चलना है तुमको,
उड़ना है तुमको, ऊंचे गगन में।
रोकेगा रस्ता, तेरी खुद की हताशा,
टूटी है हिम्मत, और छाई निराशा।
पर फिर भी साथी,
उठना है तुमको ..........
सपने तुम्हारे, अब धुंधले पड़े हैं।
लोगों की बातें, मन तोड़े पड़े हैं।
पर फिर भी साथी,
उठना है तुमको ..........
दिल तेरा छलनी, कब से हुआ है।
कड़वी बातों की गोली, से घायल पड़ा है।
पर फिर भी साथी,
उठना है तुमको ..........
अपने लोगों का सपना, फिर भी तुम्हीं हो।
कई लोगों की आशा, फिर भी तुम्हीं हो।
तुम पर टिकी है, करोड़ों निगाहें,
कि सबका भरोसा, अब तो तुम्हीं हो।
तोड़ो ये बंधन,
कि उठना है तुमको, चलना है तुमको,
उड़ना है तुमको, ऊंचे गगन में।
                 संतोष सुधाकर



पुस्तक दिवस के अवसर पर...

                    
                    पुस्तक दिवस के अवसर पर...

कितनी बदल गयी है
आज पुस्तक की दुनिया
अब तो बिन पुस्तक के ही
स्कूल है जाती अपनी मुनिया

हमारी चिर परिचित पुस्तक की जगह
ई-पुस्तक ने कब्जा जमा लिया है
पुस्तकों को पीठ का बोझ बता
उन्हें कंप्यूटर में समा दिया है

कभी ऐसा भी था पुस्तक का जमाना
जब उनींदी आँखों को पुस्तक में पड़ता छुपाना
शिक्षक की मार से पुस्तक का ढाल बनाना
पुस्तक में रख गुलाब को यादगार बनाना

पुस्तकों का आदान प्रदान  कभी मुहब्बते इजहार होता
तो कभी पुस्तकधारिणी शारदे का त्योहार होता
पुस्तकों के सहारे रेल का सफर बड़ा आसान होता
देख हाथ में पुस्तक सरे राह नाचीज़ का सम्मान होता
                                     
                                        गीता चौबे
       

Friday, 19 April 2019

        श्रीमतीजी का डिजिटल उपवास

पति ने पत्नी को आवाज़ लगायी
' अजी सुनती हो ' की गुहार लगायी

पर उनकी पत्नी तो मोबाइल में व्यस्त थी
व्हाट्स एप पर चुटकुले पढ़ने में मस्त थी

जवाब न मिलने पर पतिदेव पत्नी के पास आये
पत्नी को ठहाके लगाते देख वो भी मुस्कुराये

कहा, प्रिये! थोड़ा समय मेरे लिए भी निकालो
अपने ठहाकों में मुझे भी शामिल कर लो

पत्नी ने यूँ घूरा पति की बेतुकी बात पर
कि उन्हें दिन में तारे दिखने लगे आसमान पर

पत्नी ने कहा, ' देखो जी अपनी हद में रहो'
चुटकुलों की दुनिया से दूर अपनी मांद में रहो

' मांद ' सुनते ही श्रीमानजी का पौरुष जागा
पत्नी के ऊपर ' मोबाइल बैन ' का मिसाइल दागा

पत्नी के मोबाइल का बैलेंस खतम हो चला था
इसी मुद्दे पर पतिदेव ने मोर्चा संभाल रखा था

बैलेंस नहीं होने के कारण मोबाइल बंद पड़ा था
इसी बात पर पति महोदय का अहंकार खड़ा था

अब तो पत्नी को मोबाइल उपवास करना पड़ा
अपडेट के बिना जिंदगी का हाल हुआ बेहाल बड़ा

मन के अवसाद ने तन पर भी प्रभाव डाला
किचन में छायी वीरानी और पड़ गया ताला

अब तो श्रीमानजी का दिमाग चकराया
बड़े डॉक्टर के पास ले जाकर दिखलाया

डॉ ने कहा, यह डिजिटल उपवास का है कहर
शीघ्र इलाज कराइए, वरना फैल जाएगा जहर

पति ने तुरंत अनलिमिटेड डाटा पैक का रीचार्ज कराया
पत्नी के मोबाइल पर रीचार्ज होने का सिग्नल आया

यह देख उनके चेहरे पर अत्यंत खुशी का भाव आया
श्रीमानजी ने श्रीमतीजी का डिजिटल उपवास तुड़वाया
                                               गीता चौबे
हास्य कविता-मेरा मोबाइल 
×××××××××××××××××××

यह क्या गजब हो गया था
मेरे मोबाइल का चार्जिंग सिस्टम
खराब हो गया था
मैं बैचैन हो रही थी
चार्जिंग प्लग एक स्विच से दूसरे स्विच
में लगा रही थी
सबका परिणाम एक जैसा था
मेरा मोबाइल चार्ज नहीं हो रहा था
इसके बिना रहूँगी कैसे
मेरा दिन कटेगा कैसे
सोच सोचकर दिल
बहुत घबरा रहा था

वाट्स अप और फेसबुक की जुदाई
मुझे डरा रही थी
मुझे अपना भविष्य
अंधकार में  नजर आ रही थी
थोड़ी देर में मोबाइल पूरी तरह बंद हो गया
मेरे चेहरे से खुशी,हंसी सब खो गया

आज वाट्स अप और फेसबुक पर
किस किस विषय पर बातें होंगी
किस किस तस्वीर पर
लाइक और डिस्लाइक होगी
यही सोच कर दिन भर मन बोझिल रहा
किसी भी काम में मन न लगा

शाम में पतिदेव जब आये
साथ में दूसरा चार्जिंग तार लेकर आयें
मेरे लिए खुशियों का सौगात ले आयें
ऑनलाइन मेरी सहेलियाँ
मेरे लिए परेशान थीं
पूछ रही कई सवाल थीं
मैं खुशी से  फुली न समा रही थी
दे रही उनके हर सवाल का जवाब थी

भगवान किसी को यह दिन न दिखलाये
सबका मोबाइल उनके पास और चार्ज रहे ......

                                                   रंजना वर्मा
माइंस वाला ढाबा
**************
थोड़ी सी पुरानी ये है इक कहानी ,
सुनाती हूँ सबको मैं अपनी जुबानी।

पति के मेरे थी पोस्टिंग उस माइंस में
पढ़ा था कभी जिसको हमने भी साइंस में।

जगह थी वो प्यारी बड़ी ही सुहानी
पर ये बस नहीं है हमारी कहानी।

असली उस मुद्दे पर अब हम हैं आते
घटी थी जो घटना, उसे हैं बताते

साथी ने इनकी जब ब्याह रचाई,
वो पत्नी बेचारी बड़े शहर से आई।

देखे जो उसने थे सपने सलोने,
पूरे वो सारे थे माइंस में होने।

हम तीन जोड़ों की अच्छी थी यारी,
हुई थी जो मशहूर दोस्ती हमारी।

खाने का बाहर  हुआ जब विचार
 हो गए थे हम सब फटाफट  तैयार।

निकले थे सब लेके अपनी सवारी,
की थी पर उसने गजब की तैयारी।

तैयारी जो देखी हँसी सबको आई
पर सबने हँसी अपने मन में दबाई।

दिल में तो उसके हुआ था धमाका,
देखा जो उसने वो झोपड़ीनुमा ढाबा।

थी शानदार होटल की उम्मीद जिसको
ले आए थे ऐसे इक ढाबा में उसको।

यही वो जगह है फिर उसको बताया
फिर जोरों से सबने ठहाका लगाया।

पहले तो थोड़ी सी वो सकपकाई
फिर हँसी में हमारे थी शामिल हो आई।

वो घटना अभी भी है जब याद आती
तो होठों पे बरबस ही मुसकान लाती।

घटना है सच्ची जो हमने सुनाई
बस थोड़ीसी नमक मिर्च उसमें मिलाई।
                                           रूणा रश्मि
अंतरद्वंद्व
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होठ मौन थे पर अंतर था मुखर मुखर,
यादों के बादल आते थे उमड़ घुमड़,
कितनी खट्टी-मीठी, कड़वी यादों की,
ज़ख्मों की छालों की आई भीड़ उमड़।
एक दीप की लौ नन्ही थी डोल रही,
मेरे कंपित मन को मानो तोल रही,
बोली यादें यादें हैं यादों का क्या,
जीवन बहती धारा है क्या नहीं पता?
छोड़ किनारों को बढ़ती ही जाती है,
मुड़कर पीछे कभी लौट ना पाती है,
अक्स पुराने लाख उन्हें उलटो पलटो,
नया रंग उन पर ना चढ़ने वाला है,
नये पलों में चाहो जैसा रंग भरो,
स्वागत हो उसका जो आने वाला है।

                                   जी. सी. मिश्रा

प्रार्थना

                                     प्रार्थना 
हे अजर-अमर हे शक्तिमान
     दे दो बस इतना वरदान
          मिल जाए चाहे लाख खुशी
              पर आए ना मुझको अभिमान
                                          दुख आए मुझपर लाख मगर
                                           नहीं छुटे पल-भर सत्य डगर
                                               भूल कभी जो हो जाए तो
                                                राह दिखा ओ कृपानिधान
हे अजर-अमर हे..........
                                         कोई चाहे पाना धन औ मान
                                           कोई चाहे पाना पूर्ण जहान
                                              मैं तो बस इतना ही चाहूँ
                                         बन जाऊं मैं इक नेक इंसान 
हे अजर-अमर हे ..........
                                         घट-घट में तुम तो बसते हो
                                         हर मन की बात समझते हो
                                          मेरे मन की भी बात समझ
                                            कर दो तुम मेरा कल्याण
हे अजर-अमर हे ..........
                                                                                                                                 संतोष सुधाकर