Wednesday, 1 May 2019

ताप

ग्रीष्म का प्रचंड ताप
कर रही धरा विलाप
सूर्य की किरण किरण
बरस रहा हो ज्यों अगन।
हृदय देखो फट रहा
सिसक रही है ज्यों धरा
पौधे सभी सूख रहे
निर्जल तालाब हैं
जन्तु सब भटक रहे
नीर की तलाश में
छाँव ढ़ूँढ़ते फिरे
तनिक सुकूं की आस में
इन्द्र को पुकार रहे
बारिश की चाह में
आसमां को तक रहे हैं
बादलों की आस में।
                       रूणा रश्मि
                     राँची , झारखंड