ग्रीष्म का प्रचंड ताप
कर रही धरा विलाप
सूर्य की किरण किरण
बरस रहा हो ज्यों अगन।
हृदय देखो फट रहा
सिसक रही है ज्यों धरा
पौधे सभी सूख रहे
निर्जल तालाब हैं
जन्तु सब भटक रहे
नीर की तलाश में
छाँव ढ़ूँढ़ते फिरे
तनिक सुकूं की आस में
इन्द्र को पुकार रहे
बारिश की चाह में
आसमां को तक रहे हैं
बादलों की आस में।
रूणा रश्मि
राँची , झारखंड
कर रही धरा विलाप
सूर्य की किरण किरण
बरस रहा हो ज्यों अगन।
हृदय देखो फट रहा
सिसक रही है ज्यों धरा
पौधे सभी सूख रहे
निर्जल तालाब हैं
जन्तु सब भटक रहे
नीर की तलाश में
छाँव ढ़ूँढ़ते फिरे
तनिक सुकूं की आस में
इन्द्र को पुकार रहे
बारिश की चाह में
आसमां को तक रहे हैं
बादलों की आस में।
रूणा रश्मि
राँची , झारखंड
1 comment:
👌👌
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