Wednesday, 1 May 2019

ये मजदूर


ये मजदूर...
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सिर पे बोझ
बेबसी का टोकरा
रखे बेचारा

ये मजदूर
होते हैं मजबूर
घर से दूर

पेट की ज्वाला
अपनों को निवाला
श्रम ही देता

हो हड़ताल
तो काम का अकाल
हाल बेहाल

होती खड़ी है
इनके बल पर
ये इमारत

खून पसीना
बहाते मजदूर
साल महीना

भीषण गर्मी
आँखों में लेके नमी
सहते सभी

बने जो मकां
होता कहीं न नाम
हो गुमनाम

श्रमिक दल
खर्चे अथाह बल
बनाते कल

होती चिंता
भूख को मिटाने की
कुछ पाने की
                गीता चौबे


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