Wednesday, 1 May 2019


मजदूर की दास्तान... '

साथी हाथ बढ़ाना ' गाते मिल के ये तराना
हैं तो ये मजदूर पर, सहयोग की है भावना

बनती इमारत कहती मजदूरों की दास्तान
चलता रहे काम जबतक हो रोटी का इंतजाम

ढोते कंक्रीट की टोकरी सिर पर दिहाड़ी मजदूर
पूरे दिन श्रम करते के बाद हो जाते थक के चूर

यही है नियति इनकी, यही है प्रगति इनकी
दो जून का भोजन मिले, यही है उन्नति इनकी

लालच नहीं होता मन में कभी ज्यादा पाने का
आलस नहीं होता कभी काम से मुँह चुराने का

काम ही शक्ति, काम ही भक्ति, काम ही है पूजा
सिर पर छत हो तन पर वसन,आस न कोई दूजा
                                    गीता चौबे

2 comments:

रंजना वर्मा said...

बहुत बढ़िया 👌👌

runa said...

👌👌