कूक कोयल की..
कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
सुनो तो कोयल क्या बोले
कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
बोली में है मिश्री घोले...
सुनो तो कोयल क्या बोले
कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
बोली में है मिश्री घोले...
कितनी सुंदर है अमराई
बहती हवा ये पुरवाई
सोंधी खुशबू भू पर छाई
यही संदेशा मैं लाई...
बहती हवा ये पुरवाई
सोंधी खुशबू भू पर छाई
यही संदेशा मैं लाई...
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
कोयल की बातें सुनो ज़रा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
तरुओं से सजती ये धरा
कोयल की बातें सुनो ज़रा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
तरुओं से सजती ये धरा
तरुवर भी कितने झूम रहे
अंबर को जैसे चूम रहे
मत काटो तुम इन पेड़ों को
खोदो मत इनकी जड़ों को
अंबर को जैसे चूम रहे
मत काटो तुम इन पेड़ों को
खोदो मत इनकी जड़ों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
करती बयां अपना डर है
कूहू - कूहू... कूहू-कूहू...
वृक्षों पर ही इनका घर है
करती बयां अपना डर है
कूहू - कूहू... कूहू-कूहू...
वृक्षों पर ही इनका घर है
इनके डर को महसूस करो
इनके घर को महफूज़ रखो
है कूक में इनकी दर्द बड़ा
भीषण संकट है आन पड़ा
इनके घर को महफूज़ रखो
है कूक में इनकी दर्द बड़ा
भीषण संकट है आन पड़ा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू
पेड़ अगर जो बच पाएंगे
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
खग के सरगम तब लहराएंगे
पेड़ अगर जो बच पाएंगे
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
खग के सरगम तब लहराएंगे
चिड़ियों के इस मधु कलरव से
पादप के नव किसलय दल से
मानव की अगली पीढ़ी को
मत दूर करो अपने छल से
पादप के नव किसलय दल से
मानव की अगली पीढ़ी को
मत दूर करो अपने छल से
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
गौर करो इन बातों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
समझो इनके जज़्बातों को
गौर करो इन बातों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
समझो इनके जज़्बातों को
कटना पेड़ों का बंद करो
प्रकृति के साथ ना जंग करो
जीवन अपना समृद्ध करो
कोयल की कूक लयबद्ध करो
स्वरचित
गीता चौबे
रांची झारखंड
प्रकृति के साथ ना जंग करो
जीवन अपना समृद्ध करो
कोयल की कूक लयबद्ध करो
स्वरचित
गीता चौबे
रांची झारखंड
1 comment:
प्रकृति ही जीवन दायिनी है और इसकी रक्षा हमारा कर्तव्य । सुन्दर रचना 👌👌👌👍
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