Monday, 27 May 2019


कूक कोयल की..

कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
सुनो तो कोयल क्या बोले
कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
बोली में है मिश्री घोले...
              कितनी सुंदर है अमराई
              बहती हवा ये पुरवाई
              सोंधी खुशबू भू पर छाई
              यही संदेशा मैं लाई...
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
कोयल की बातें सुनो ज़रा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
तरुओं से सजती ये धरा
              तरुवर भी कितने झूम रहे
              अंबर  को  जैसे  चूम  रहे
              मत काटो तुम इन पेड़ों को
              खोदो मत इनकी जड़ों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
करती बयां अपना डर है
कूहू - कूहू... कूहू-कूहू...
वृक्षों पर ही इनका घर है
             इनके डर को महसूस करो
             इनके घर को महफूज़ रखो
             है कूक में इनकी दर्द बड़ा
             भीषण संकट है आन पड़ा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू
पेड़ अगर जो बच पाएंगे
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
खग के सरगम तब लहराएंगे
             चिड़ियों के इस मधु कलरव से
             पादप के नव किसलय दल से
             मानव की अगली पीढ़ी को
             मत दूर करो अपने छल से
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
गौर करो इन बातों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
समझो इनके जज़्बातों को
             कटना पेड़ों का बंद करो
             प्रकृति के साथ ना जंग करो
             जीवन अपना समृद्ध करो
             कोयल की कूक लयबद्ध करो
                   स्वरचित
                  गीता चौबे
                 रांची झारखंड

1 comment:

संतोष सुधाकर said...

प्रकृति ही जीवन दायिनी है और इसकी रक्षा हमारा कर्तव्य । सुन्दर रचना 👌👌👌👍