Monday, 27 May 2019


*हाय! क्या कर डाला हमने?

विधाता ने इस धरती को
सौंदर्य का अद्भुत रूप दिया
जल-संसाधनों से परिपूर्ण कर
पेड़-पौधों का सुंदर परिधान दिया
             तालाब, झरनों के जेवर देकर
             दुल्हन - सा श्रृंगार किया
             पत्तियों का घूँघट ओढ़े अवनि जब
             शरमाई सी दिखती थी
सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ती मुख पर
तब अलसाई - सी लगती थी
सखी प्रकृति संग लताओं के झूले पर
अंबर तक पेंग चढ़ाती थी
             मलिन हुई भूमि की छवि
             जब हम बच्चों का आविर्भाव हुआ
             मुफ्त की मिली संपत्ति से
             लालच का प्रभाव हुआ
और... और... पाने की इच्छा ने
धरती माँ को शर्मसार किया
काट जंगलों को जब हमने
इस माँ को ही निर्वस्त्र किया
             तपती गर्मी से झुलसी काया.
             तिस पर भी नहीं आयी माया
             तोड़ दिए ताल - तलैयों के जेवर
             भू को श्रृंगार विहीन किया
शस्य-श्यामला धरती जो कभी उर्वर थी
बच्चों के कुकर्मों से बंजर हुई
फट गयी छाती दुखों से
भूमि जल से इतर हुई
             हम कपूत बच्चों के कारण
             इस माँ की हालत जर्जर हुई
             अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है
             गर संभल जाएं जो हम
जल बचाने की खातिर फिर से
नया जंगल उगाएं जो हम
फिर से अपनी धरती माँ को
शस्य-श्यामला बनाएं हम
             पेड़ लगाएं, मेघों को बुलाएं
             वो जल बरसाएं, हम जल बचाएं
             भू को फिर से उर्वर बनाएं
             ताल-तलैयों को फिर से सजाएँ
             फटी दरारें भर जाएंगी
             जलाप्लावित धरती माँ मुस्कुराएगी
                           गीता चौबे
                         रांची झारखंड







सफलता की कुंजी
************
लक्ष्य हो निश्चित तभी है होता सफल हरेक इंसान,
कदम बढ़ाओ तभी कि जब हो तुम्हें लक्ष्य का ज्ञान।

सजग रहो जीवन में और रखो मंजिल का ध्यान
तैयारी करके ही पूरी, फिर चढ़ना सोपान।

मेहनत और लगन ही होती, है जीत कुंजी
और सफलता ही होती है, मानव जन की पूँजी।

जान गया ये मंत्र जो इंसां, अपने इस जीवन में
मिलती तभी सफलता, हौसला होता उसके मन में।
               रूणा रश्मि
             राँची , झारखंड

कूक कोयल की..

कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
सुनो तो कोयल क्या बोले
कूहू - कूहू.... कूहू - कूहू...
बोली में है मिश्री घोले...
              कितनी सुंदर है अमराई
              बहती हवा ये पुरवाई
              सोंधी खुशबू भू पर छाई
              यही संदेशा मैं लाई...
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
कोयल की बातें सुनो ज़रा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
तरुओं से सजती ये धरा
              तरुवर भी कितने झूम रहे
              अंबर  को  जैसे  चूम  रहे
              मत काटो तुम इन पेड़ों को
              खोदो मत इनकी जड़ों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
करती बयां अपना डर है
कूहू - कूहू... कूहू-कूहू...
वृक्षों पर ही इनका घर है
             इनके डर को महसूस करो
             इनके घर को महफूज़ रखो
             है कूक में इनकी दर्द बड़ा
             भीषण संकट है आन पड़ा
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू
पेड़ अगर जो बच पाएंगे
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
खग के सरगम तब लहराएंगे
             चिड़ियों के इस मधु कलरव से
             पादप के नव किसलय दल से
             मानव की अगली पीढ़ी को
             मत दूर करो अपने छल से
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
गौर करो इन बातों को
कूहू - कूहू... कूहू - कूहू...
समझो इनके जज़्बातों को
             कटना पेड़ों का बंद करो
             प्रकृति के साथ ना जंग करो
             जीवन अपना समृद्ध करो
             कोयल की कूक लयबद्ध करो
                   स्वरचित
                  गीता चौबे
                 रांची झारखंड

Friday, 24 May 2019

जाकी रही भावना जैसी....

रवि मैकडोवेल् एण्ड कम्पनी में सिनियर क्वालिटी कंट्रोल औफिसर था और दक्षिण भारत से ट्रांसफर हो कर आज ही रांची आया था। रांची में रवि कम्पनी के गेस्ट हाउस में रुका था, जिसका केयर टेकर 'बिंगा', बिल्कुल नया नेपाली गोरा चिट्टा, छोटे कद का हंसमुख बन्दा था।
३६ घण्टे की लम्बी यात्रा कर रवि रांची आया था सो उसके सिर में तेज दर्द हो रहा था। वह थोड़ा फ्रेश होकर सेन्ट्रल हौल में रखे सोफे पर आराम करने के लिए बैठ गया। बिंगा ने सोचा कि साहब बहुत थक गए होंगे, तो शायद कोई drinks लेना पसंद करेंगे। बड़े अदब से एक ट्रे में ठण्ढे पानी की एक बोतल, सोडा की एक बोतल और एक खाली गिलास, शीशे की मेज़ पर लाकर आहिस्ता से रख दिया। फिर एक प्लेट में भुना हुआ काजू और चिप्स भी ला कर रखते हुए उसने रवि से धीमी आवाज में पूछा "साब और कुछ लाऊं?"
चुकी रवि के सर में बहुत दर्द हो रहा था सो उसने कहा हां एक नव रत्न तेल लेते आओ। बिंगा हड़बड़ाहट में तेल शब्द सुना नहीं। उसे लगा कि ये तो दारु  कम्पनी के बड़े साहब हैं तो हो न हो ये जो बोल रहे हैं वह कोई व्हिसकी का नया ब्रांड होगा, सो नव रत्न व्हिसकी ढुंढता वह आस-पास की सभी शराब की दुकानों की खाक छानने लगा, किन्तु उसे नव रत्न व्हिसकी कहीं नहीं मिली। सारे दुकान वाले बोले कि इस ब्रांड की कोई व्हिसकी नहीं होती। बिंगा सोचता रहा ये नये साहब क्या सोचेंगे मैं उनकी पसंद की व्हिसकी भी नहीं ला पाया। फिर उसने सोचा नव रत्न तो नहीं मिला तो कम से कम कोई अच्छी व्हिसकी ले लेता हूं, सो सिंगल मौल्ट की एक बोतल उसने साहब के लिए ले ली।
वो ज्योंहि गेस्ट हाउस में प्रवेश किया तो रवि ने अधीर सर्वर में पूछा "क्या हुआ नव रत्न का ,दर्द से सर फटा जा रहा है।" बिंगा ने रवि को समझाया कि यहां किसी भी दुकान में नहीं मिला, इसलिए सिंगल मौल्ट ले लिया हूं। रवि चिल्ला उठा "क्या मैं इसे सर पर लगाऊं..........."

Thursday, 16 May 2019

चाँदनी रात

🌷🌷चाँदनी  रात🌷🌷
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

चाँद का खिला शबाब
चाँदनी की चादर में
लिपट गया संसार
सितारे भी मुस्करा रहे
आपस में बतिया रहे
जिन्दगी की तपिश ने
दिल को जला दिया
चाँद की मखमली रौशनी ने
आकर प्यार से सहला दिया
चाँदनी के फौव्वारे में
मैंने बदन अपने धो लिये
प्यार के फूल जो कुम्हला गये थे
फिर से जी उठे
खुशियाँ एक बार फिर
मेरे दहलीज पर आयीं
फूलों की खुशबू से
बगिया मेरी खिल उठी
ऐ चाँद फिर आकर
मेरे दर पर मुस्कुराना
खुशियों से  भर जायेगा
मेरा ये छोटा सा आशियाना....

                रंजना वर्मा

Tuesday, 7 May 2019

अक्षय तृतीया

लघुकथा--अक्षय तृतीया
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

आज अक्षय तृतीया का मतलब आज के दिन गहना खरीदना शुभ होता है,ज्यादातर लोग यही मानते हैं ।रेखा की भी सारी सहेलियों ने तरह तरह के गहने खरीदें ।वे एक दूसरे को फोन कर अपने गहनों के बारे में बता रहीं थीं और पूछ भी रही थीं ।उनलोगों ने रेखा से भी पूछा कि उसने क्या खरीदा?रेखा ने कहा कि उसके लिए हीरा आ रहा है ।गहना खरीदने की सार्थकता तब ही है जब उसे सब देखें ।तय हुआ कि किसी एक के यहाँ सभी इकट्ठा हों और अपने गहने एक दूसरे को दिखायें।रेखा ने कहा कि सभी उसके यहाँ ही आ जायें, तब तक उसका हीरा भी आ जायेगा ।
         थोड़ी देर बाद रेखा के यहाँ बड़ी चहल पहल थी ।चाय नास्तों के बीच गहनों की भी देखा देखी हो रही थी।तभी घंटी बजी ।रेखा ने दरवाजा खोला ।उसकी कामवाली कमला अपनी बेटी के साथ हाथों में मिठाई का डब्बा लिए खड़ी थी।उसे देखकर रेखा अपनी सहेलियों से  बोली,"देखो मेरा हीरा आ गया।कहते हैं न कि अक्षय तृतीया के दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं,उनका अक्षय फल मिलता है ।आज से चार साल पहले आज के ही दिन मैंने कमला की बेटी की काबिलियत को देखकर उसे पढ़ाने का संकल्प लिया था ।आज ये दसवीं में अपने पूरे विद्यालय में प्रथम आयी है ।मैं इसी हीरे की बात कर रही थी।इस हीरे की चमक के सामने सारे गहने फीके हैं ।"रेखा गर्व से मुस्करा रही थी।

                         रंजना वर्मा

Sunday, 5 May 2019

खुशी

थोड़ा सा मुसकुराओ😊😊
*********************
भटक रहे हैं यहाँ वहाँ
खुशी न जाने मिले कहाँ
पर खुशियों का है जो खजाना
मुश्किल नहीं इसे है पाना
ढ़ूँढ़ो अपने घर के अंदर
झाँको अपने मन के अंदर
बागों के रौनक को देखो
रंग बिरंगे फूल खिले हैं
पंछी का कलरव यूँ लगता
वायु में संगीत घुला है
नन्हा बालक दौड़ रहा है
और हँस रही प्यारी गुड़िया है
इस जग में चहुँ ओर जो देखो
खुशी के मोती बिखरे पड़े हैं
हाथ बढ़ाकर इन्हें उठाओ
सुंदर सा एक हार बनाकर
इन खुशियों को गले लगाओ।
                                     रूणा रश्मि
                                  राँची , झारखंड

Friday, 3 May 2019

लाल डायरी

लघुकथा-लाल डायरी
××××××××××××××

 सौम्या की हाथों में उसकी माँ अनुपमा की डायरी थी।उसकी आँखों से अश्रु की अविरल धारा बह रही थी ।उसे अपने पर बहुत ग्लानि हो रही थी ।वह सोच रही थी ।सभी कहते थे कि, उसमें और उसकी  बहन कली में कितना फर्क है ।लगता ही नहीं है कि दोनों सगी बहनें हैं ।कली बहुत ही खुबसूरत,शांत,पढ़ाई और खेल सबमें अव्वल थी।वहीं वह सांवली एवं साधारण रंग-रूप की लड़की थी।उसका एक ही काम था ,कली से ईर्ष्या करना।माँ बाप उसे अधिक प्यार करते थे ,जिसका वह नाजायज फायदा उठाती थी।कली की पसंद की हर चीज वो छिन लिया करती थी।
        सुबह कली अपने पिता के साथ बाजार गयी और वहाँ से अपने लिए एक सुन्दर गुलाबी ड्रेस खरीद कर लायी।जब वह पहन कर अपनी माँ को दिखा रही थी, तो सभी दंग रह गये।एकदम वह एक गुलाबी परी लग रही थी।सौम्या ईर्ष्या से बर्दाश्त नहीं कर पायी और वह गुस्से चिल्लाने लगी,"आपलोग कली के लिए ही अच्छी ड्रेस खरीदते हैं ।मेरे लिए नहीं ।"अनुपमा और उसके पति ने उसे बहुत समझाया कि उसके लिए भी वैसी ही ड्रेस ला देंगे,पर वह नहीं मानी।गुस्से में अपने कमरे में जाकर रोती रही ।सभी उसे मनाते रहे पर वह नहीं मानी।रोते रोते उसकी आँख लग गयी।जब उसकी आँखे खुली तो उसने देखा कि, उसकी माँ अनुपमा एक  लाल रंग की डायरी में कुछ लिख रही है ।उसकी उत्सुकता बढ़ी कि, "माँ क्या लिख रही है ।इस पुरानी लाल डायरी को उसने अभी तक क्यों नहीं देखा।"वह आखें बंद कर सोने का अभिनय करती रही ।जैसे ही उसकी माँ कुछ काम से बाहर गयी,उसने डायरी उठा लिया ।
        जल्दी जल्दी वह डायरी पढ़ने लगी।डायरी पढ़कर वह स्तब्ध रह गयी।वह अनुपमा की नहीं,बल्कि उसकी बहुत प्रिय सहेली विजया की बेटी है ।जिसे विजया ने मरते समय अनुपमा की गोद में डाल दिया था।डायरी के आखरी पन्ना पर कुछ पंक्तियाँ मोती की तरह चमक रही थी।"कली के रहते सौम्या कभी खुश नहीं रह सकती।इसलिए मैंने और मेरे पति ने निर्णय लिया है कि, कली को हाॅस्टल में  डाल देंगे ।"
       सौम्या चिल्ला उठी,"नहीं माँ ऐसा मत करना ।"
     
                             रंजना वर्मा

Thursday, 2 May 2019

अजनबी

××××अजनबी ××××
---------------------------

कभी लगती अपनी,
कभी लगती अनजानी सी
ऐ जिंदगी लगती तू अजनबी सी
इतने साल रह तेरे संग
अभी भी हूँ तेरे से दंग
मैं साथ निभाया अपनो की तरह
रही तू अजनबी की तरह
आने वाली विपत्ति की
एक दस्तक तो दो
सामना कर सकूँ
मुझमें हिम्मत तो दो
मैं मुसीबत में,तू चुपचाप रहती
मैं संभलती रहती,तू साथ चलती
हर पल,हर वक़्त लगता बड़ा अनजाना
तेरा मेरा साथ बहुत पुराना
भरती जब खुशियों से झोली मेरी
तुम भी मेरे संग हँसती मुस्कुराती
फिर भी कभी लगती अपनी
कभी अनजानी सी
ऐ जिंदगी लगती तू अजनबी सी ....

                      रंजना वर्मा

Wednesday, 1 May 2019

ये मजदूर


ये मजदूर...
*********
सिर पे बोझ
बेबसी का टोकरा
रखे बेचारा

ये मजदूर
होते हैं मजबूर
घर से दूर

पेट की ज्वाला
अपनों को निवाला
श्रम ही देता

हो हड़ताल
तो काम का अकाल
हाल बेहाल

होती खड़ी है
इनके बल पर
ये इमारत

खून पसीना
बहाते मजदूर
साल महीना

भीषण गर्मी
आँखों में लेके नमी
सहते सभी

बने जो मकां
होता कहीं न नाम
हो गुमनाम

श्रमिक दल
खर्चे अथाह बल
बनाते कल

होती चिंता
भूख को मिटाने की
कुछ पाने की
                गीता चौबे


पानी रे पानी

पानी रे पानी
***********
पानी रे पानी अजब तेरी कहानी
 मिलती है तुझसे ही सबको जिंदगानी।

जल बिन है असंभव जीवन
कहता है धरती  पर जन जन।

हर जीवन को आस है तेरी
जीव जन्तु को प्यास है तेरी।

तुझको पाकर सुकूं जो आया
लगा कि जैसे अमृत पाया।

पर तेरी जब बिगड़ी चाल
बुरा हो गया सबका हाल।

हो गया फिर जीना दुष्वार
और मच गया हाहाकार।

जल जब चहुँदिस भरने लगे
त्राहि त्राहि सब करने लगे।

घड़ी आ गई बड़ी विकट
जीवन पर आया संकट।

अमृत का जो रूप था तेरा
विष का क्यों अब स्वरूप हो गया।

दिखते हैं दो अलग रूप ये
पर तेरे ही हैं स्वरूप ये।

पालनहार का एक रूप है
संहारक दूजा स्वरूप है।

करो कभी नहीं संहार
बने रहो बस पालनहार।
                           रूणा रश्मि

मजदूर

×××मजदूर दिवस ×××
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

लगी मजदूरों की मंडी
प्रतीक्षारत खड़ी मजदूरों की टोली
ठेकेदार सब आयेंगे
ट्रकों में  ये ढूंसे जायेंगे
इमारतों की नींव
इनके पसीने से सींचते
ईटों में इनकी यादें बसते
दिन भर ये मेहनत करते
रातों में घोड़े बेच कर सोते
रोज कमाते,रोज खाते
काम मिला तो बल्ले बल्ले
नहीं तो खाली पेट सोते
आलीशान घर दूजे के लिए बनाते
खुद एक झोपड़े को तरसते
काम और खाना,नहीं होता काम दूजा
बचपन यहाँ दम तोड़ता
और फिर मजदूर पैदा होता ...

                      रंजना वर्मा

मजदूर की दास्तान... '

साथी हाथ बढ़ाना ' गाते मिल के ये तराना
हैं तो ये मजदूर पर, सहयोग की है भावना

बनती इमारत कहती मजदूरों की दास्तान
चलता रहे काम जबतक हो रोटी का इंतजाम

ढोते कंक्रीट की टोकरी सिर पर दिहाड़ी मजदूर
पूरे दिन श्रम करते के बाद हो जाते थक के चूर

यही है नियति इनकी, यही है प्रगति इनकी
दो जून का भोजन मिले, यही है उन्नति इनकी

लालच नहीं होता मन में कभी ज्यादा पाने का
आलस नहीं होता कभी काम से मुँह चुराने का

काम ही शक्ति, काम ही भक्ति, काम ही है पूजा
सिर पर छत हो तन पर वसन,आस न कोई दूजा
                                    गीता चौबे

ताप

ग्रीष्म का प्रचंड ताप
कर रही धरा विलाप
सूर्य की किरण किरण
बरस रहा हो ज्यों अगन।
हृदय देखो फट रहा
सिसक रही है ज्यों धरा
पौधे सभी सूख रहे
निर्जल तालाब हैं
जन्तु सब भटक रहे
नीर की तलाश में
छाँव ढ़ूँढ़ते फिरे
तनिक सुकूं की आस में
इन्द्र को पुकार रहे
बारिश की चाह में
आसमां को तक रहे हैं
बादलों की आस में।
                       रूणा रश्मि
                     राँची , झारखंड