Monday, 10 June 2019


                    लघुकथा  9/6/2019
                     तानाशाही सोच
       '' अंजलि! चलो जल्दी से तैयार हो जाओ... तुम्हें भी शादी में चलना है। ''
  'पर थोड़ी देर पहले तो आप कह रहे थे कि सिर्फ़ मैं ही जाऊँगा, तुम्हें जाने की जरूरत नहीं है... अब अचानक ऐसा क्या हो गया?' '
' 'यार तुम तो बाल की खाल निकालने लगती हो... जब बोल रहा हूँ कि चलना है तो फिर चलना है।' '
' फिर भी कुछ पता तो चले... '
' मेरे दोस्त सपत्नीक जा रहे हैं... इसलिए तुम्हें भी चलना है।'
    '' पर ऐसे कैसे जा सकती हूँ, वह भी शादी में? ''
'' क्यों, अभी आधा घंटा है... कितना टाइम लगता है तैयार होने में? कोई बहस नहीं... जाओ जाकर तैयार हो जाओ। ''
      '' नहीं, मैं नहीं जा सकती '' इतनी नोक-झोंक के बाद पत्नी ने अपना फैसला सुना दिया।
   '' आजकल की पत्नियां सिर पर चढ़ नर्तन करने लगी हैं ''... भुनभुनाता हुआ पति गुस्से में पत्नी को सफाई का मौका दिए बिना अकेले ही शादी में चला गया।
    अहंकार ने एक बार फिर अपना फन ऊपर उठाया और पत्नी को कटघरे में खड़ा कर दिया।
                                          मौलिक
                                        गीता चौबे
                                      रांची झारखंड

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